पांडव प्रपात से हमने प्रकृति का शुद्ध जल अपनी बोतल में भरा और वापस जाने के लिए सीढ़ियों को देखा लगा कि यार जितना आनंद और सुकून यहाँ रहा अब सीढ़ियां चढ़ने में पता चलेगा।
खैर जितना हमें लग रहा था उतना मुश्किल नहीं रहा उन सीढ़ियों पर ऊपर जाना।
शायद उस स्थान पर बिताये हुए अच्छे और स्फूर्तिदायक पलों की वजह से शरीर और मन दोनों ही तरोताज़ा हो गए थे।
हम लोग ऊपर पहुँचे। ऊपर चंद्रशेखर आजाद जी की मूर्ती स्थापित है। और पांडव प्रपात का ऐतिहासिक महत्व लिखा हुआ है, भारत की आज़ादी की लड़ाई के सन्दर्भ में इतिहास में 4 सितम्बर 1929 को इस स्थान पर क्रांतिकारियों की बैठक हुई थी। जिसके अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद जी थे।
सोच कर भी अजीब सा एहसास जागृत हो जाता है की क्रांतिकारियों का जज़्बा क्या रहा होगा जो ऐसे वीराने और भयंकर जंगल में बिना किसी खास सुविधाओं के बैठकें करते रहे होंगे। यदि आज से तुलना की जाय उस वक़्त की तो उस समय तो यह स्थान दुर्गम स्थानों की श्रेणी में ही रहा होगा।
जज़्बे को सलाम है।
खैर वापस हम लोग 600 मीटर की उस सड़क पर मस्ती करते हुए चल दिए। फ़ोटो खींचे गए सबकी मर्ज़ी के हिसाब से, कुल मिला कर बहुत ही अच्छी दोपहर और शाम बीती।
वापस आये तो ऑटो वाले भैया मुस्कुराते ही मिले। चेहरे पर कोई तनाव या झल्लाहट नहीं कि गधों कितना समय लगाया।
संतुष्टि बड़ी चीज़ है। चाहते और कहते सब हैं, मिलती किसी किसी को है। हालाँकि हासिल खुद ही करना है। दे कोई नहीं सकता।
खैर हम तीनों उनके ऑटो में बैठ गए और सवारी चल पड़ी वापस खजुराहो की तरफ।
रास्ते भाई अगले दिन और शाम का प्रोग्राम बनाते रहे। सारा जीवन हम प्रोग्राम ही बनाते रहते हैं, और उस प्रोग्राम से इतर कुछ भी घटित होना हमें पसंद नहीं।
सब बातों व घटनाओं पर हम खुद का नियंत्रण चाहते हैं।
यही संतुष्टि की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता है।
केन नदी के पुल पर खड़े होकर अस्त होते सूर्य को देखना बहुत गजब का एहसास था। कइयों के लिए यह एडवेंचर, कइयों के लिए बस रोज घटित होती घटना, कइयों के लिए फ़ोटो के लिए बेहतरीन क्षण, मेरे लिए क्या था मैं उसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता।
कुछ मेरे अंदर में उतरता सा मालूम पड़ता है। हमेशा जहाँ भी सूर्यास्त देखता हूँ।
केन नदी के पुल के ऊपर से वो दृश्य बहुत से एहसास दे गया।
वहाँ से आगे बढे, 4 या 5 kms के बाद जहाँ से मुख्य सड़क छोड़ कर हमें गाँव के बीच वाले रास्ते पर उतरना था, बस वहीँ कोने पर मुझे चाय की दुकान दिख गई। मैंने ऑटो रुकवा दिया। चाय की दुकान बस वैसी ही थी जैसे किसी पिछड़े गाँव देहात के चौराहे पर होती है...
चूल्हा मिट्टी का, काला पड़ चुका चाय बनाने वाला बर्तन, उसके बगल में चाय लिए और इंतज़ार में केतली, ऊपर कचरी पापे और रस की धूल से ढकी पिन्नियां,
एक कढ़ाई जिसका रंग ब्लैक होल से भी काला, उसमें जाने कौन सा तेल जल कर लालिमा लिए हुए, और बगल में समोसे पड़े हुए जो आकार से समोसी नाम की गरिमा बढ़ाते हुए।
खैर दुकान जैसी भी रही हो, मैंने वहाँ चाय पीने का मन बना लिया था, 4 चाय का आर्डर दिया, चाय बनने में ज्यादा समय नहीं लगा, हाथ में चाय आई तो उन समोसियों ने बड़ी आस के साथ देखा, मैंने भी कहा कि जैसी भी हो तुम, मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। और 2 उठा ली खाने को, रविंदर भी लालायित हुआ, उसने भी भोग लगाया, मैंने ऑटो ड्राईवर शैलेन्द्र से कहा की भैया आप भी लो, वो माने और उन्होंने भी समोसों का आनंद लिया, दुकान का रंग रूप जो भी रहा हो, समोसे स्वादिष्ट थे, या भूख के कारण लग रहे थे, इसका निर्णय अभी तक नहीं कर पाया।
वहाँ से चाय की च्यास मिटा कर हम सभी ऑटो पर सवार होकर खजुराहो के तरफ निकले।
खजुराहों पहुँचते पहुँचते शाम के 7 बज गए, अँधेरा हो गया था, सोचा की लाइट & साउंड शो देखेंगे, पर सोचा हुआ सदैव पूरा नहीं होता।
खजुराहो में प्रवेश करते ही फिर से च्यास लग गई, शैलेन्द्र ने बताया की यहाँ चाचा जान की मशहूर चाय मिलती है, हम सभी ने मशहूर शब्द को गंभीरता से लिया और चाचा जान को भी।
ऑटो सीधा चाचा की चाय की दुकान के सामने रुका, जो की खजुराहो में प्रवेश करते ही है, पूर्वी परिसर से 2 km पहले सड़क के किनारे ही।
दुकान जो कि दुकान कम और खोखा ज्यादा थी, अँधेरे से सराबोर, भंगेडियों का अड्डा सी जान पड़ी, मशहूर शब्द से कसम से विश्वास ही उठ गया, पर जब रुके ही हैं तो चाय तो पीनी बनती थी, यात्रा का यही आनंद है, कुछ निश्चित नहीं।
60 से 70 साल के चाचा थे, चचा जान थे, ईश्वर उन्हें दादा परदादा बनाये, वो चाय बनाने में ऐसे तल्लीन दिखे जैसे कोई माँ अपने नवजात शिशु की तेल मालिश कर रही हो, किसी के आने से बेख़बर, किसी साधू की तरह समाधी में मस्त, हमने चाय के लिए बोल कर समाधी में व्यवधान डाला, चचा बड़े निश्चिन्त भाव से बोले कुछ नहीं, बस सर हिला कर, नज़रों से इशारा किया की हुज़ूर दिल्ली वालों तशरीफ़ रखो।हम सभी बैठने के लिए स्थान तलाशते उस से पहले वहाँ उपस्थित उनके रोज के बूढ़े ग्राहकों ने अपनेपन का परिचय देते हुए कुर्सियां खाली करके हमें बैठने का आग्रह किया, अजीब लगा, किन्तु उनका आग्रह टाला नहीं, बैठ गए, मद्धिम से प्रकाश में कीट पतंगे हमसे अटखेलियां सी करने लगे, हमने भी उन्हें शोहदों सा सम्मान दिया, मने नज़रअंदाज़ किया, जैसे आने जाने वाली नवयुवतियां गली के लुच्चों के साथ करती हैं, तकरीबन 15 मिनट के बाद मशहूर चाय बनी, लगा जैसे चचा की समाधी पूरी हुई, तेल मालिश ख़त्म।
यहाँ एक बात कहना चाहूँगा, चाय पीकर ज़रा भी अफ़सोस न हुआ वहाँ रुकने का, और इंतज़ार करने का।
चाय वाक़ई में गजब स्वाद लिए हुए थी, सच में लाज़वाब।
वैसी चाय और बनाने वाला दोनों ही संसाधनों की कमी के होते भी मशहूर हुए बिना नहीं रह सकते हैं।
चाय का स्वाद लिया, धन्यवाद पैसों के संग दिया और खजुराहो बाज़ार की तरफ हो लिए
बाज़ार पहुँचें तो सभी ने अगले दिन पन्ना टाइगर रिज़र्व जाने का प्लान बनाया, मैं थोड़ा सा संशय में था जाने के क्योंकि मुझे पता था की अभी 16 तारीख को ही रिज़र्व आम जनता के लिए खुला है, और अभी टाइगर दिखने की सम्भावना न के बराबर थी, क्योंकि सर्दियाँ अभी कायदे से प्रारम्भ नहीं हुई थी ऐसे में टाइगर के दिखने की सम्भावना कम थी, मुझे लगा की मित्रों को टाइगर नहीं दिखा तो कहीं मायूसी यात्रा का मज़ा न किरकिरा कर दे, फिर भी जो जैसा की तर्ज़ पर होने दिया और सफारी के लिए जीप बुक कर दी, 2000 हज़ार में बात तय हुई, यही रेट हैं मारुती जिप्सी के खजुराहो से पन्ना टाइगर रिज़र्व घुमा के लाने के। जीप मिलने में दिक्कत न हो इसके लिए ऑटो ड्राईवर शैलेन्द्र ने हमारी मदद की। और अगली शाम रिज़र्व से वापसी पर मिलने का वादा करके वो चले गए, हम तीनों मित्र बाज़ार में घुमते रहे, कुछ तलाशते रहे जो की नहीं मिला।
हॉटेल के कमरे में आये, थके थे, और थकान मिटाने का साज़ों सामान वीर बहादुर भाई साथ लेकर आये थे, तो महफ़िल सज गई, बकलोली होती रही, पर विकटें नहीं गिरी, हाँ पारी लंबी चली, इतनी लंबी की खाने का जब होश आया तो पता चला की अब शायद खाना न मिले कहीं।
होटल जिसमें ठहरे थे वहाँ कुछ था नहीं खाने को तो बाज़ार व रुख किया, वहाँ जगह जगह रामलीला का मंचन चल रहा था, उम्मीद जगी की भोजन मिल जाएगा, एक रेस्टोरेंट पर गए, वो लोग सामान समेट कर खुद ही खाने में लगे थे, पर अथिति देवो भवः
उन्होंने हमें बैठने को कहा और यथासंभव भोजन बना कर लाये, हमने किया की नहीं याद नहीं, पर पैसे पूरे चुकाए और चल दिये कमरे की तरफ़।
सुबह जल्दी जागना था
खैर सुबह जल्दी जाग गए सभी बंधू, नहा धो कर तैयार हुए, पानी की बोतलें भरी, और होटल के नीचे उतरे, जीप वाले भैया ठीक 5 बजे प्रातः आ गए। और हम सभी टाइगर रिज़र्व की तरफ़ चल दिए, अँधेरे में सड़क पर केवल जीप की रौशनी का सहारा था, सड़क बहुत अकेली सी थी, सब साथ के लिए, सबके लिए फिर भी तन्हा
ठीक 6 बजे हम रिज़र्व पहुँचे और गाइड किया, रिज़र्व के प्रवेश के लिए और गाइड जो की अनिवार्य है दोनों का शुल्क चुकाया, 1600 रुपयों के आस पास था। और हर हर महादेव का उदघोष करते हुए टाइगर रिज़र्व में बाघ दिखने की आशा में प्रवेश किया
पन्ना टाइगर रिज़र्व में विभिन्न प्रकार की किस्में हैं पेड़ों की, किन्तु तेंदू पत्ते वाले पेड़ बहुतायत में हैं।
बस अब इन्हीं पेड़ पौधों का सहारा था मुझे तो, बाकी दोनों मित्रो को बाघ दिखने की आशा थी
मुझे उस जंगल का नितांत वातावरण मोहित किये हुए था, उसकी ख़ामोशी को मैं अपने अंदर गहरे में उतार लेना चाहता था, पर असफल रहा हमेशा की तरह। पर जितना भी महसूस किया, वो गजब था।
यहाँ से वहाँ घुमते रहे, बहुत से जानवर दिखे, हिरन भालू चीतल, सियार, जंगली कुत्ते, पर वो जालिम नहीं दिखा जिसकी चाहत थी, चाहते अक़्सर अधूरी रह जाती हैं, इसी अधूरेपन में ज़िन्दगी पूरी करनी पड़ती है, यात्रा का आनंद इसी अधूरेपन में है यदि कोई ले सके, समझ सके
कमबख्त टाइगर नहीं दिखा, एक दिन पहले दिखा था अपने परिवार के साथ, रिहाइशी इलाके की तरफ वाली सड़क के बीचों बीच महफ़िल जमाई थी, बड़ी देर के बाद जंगल की तरफ गया, ऐसी सूचना हमें गाइड ने दी, और जहाँ जहाँ कॉल होती रही टाइगर की वहाँ वहाँ जिप्सी को ले जाते रहे गाइड और ड्राईवर, कॉल का मतलब जंगल में बाकी छोटे मोटे जानवरों की उन आवाज़ों से है जो वो टाइगर को देखने पर निकालते हैं, गाइड पहचान जाता है अपने अनुभव से, थोड़ी देर बाद हम भी अनुभवी होने लगे थे, पर अनुभव जो समय के साथ आये वही काम आता है।
टाइगर नहीं दिखा
और हम दोपहर 12 बजे तक जंगल से बाहर आ गए, सीधे खजुराहो गए, जिप्सी वाले ने बाज़ार में ड्राप किया, हमने ऑटो वाले को फ़ोन किया, पर क़ो एअरपोर्ट गया हुआ था, उसने किसी दुसरे ऑटो वाले को भेजा, उस से बात तय हुई की हमें पश्चिमी भाग वाले और दक्षिणी भाग वाले मंदिरो को दिखायेगा, फिर स्टेशन ड्राप करेगा।
बात तय हो गई, हमने मंदिर देखे, शाम को स्टेशन पहुँचें और प्लेटफार्म के अंतिम छोर पर जहाँ कुछ कुत्तों के अलावा हम कुत्ते थे, महफ़िल जमाई, समझ गए न???
ट्रेन चलने में जो समय बचा था उसका सदुपयोग बचे हुए साज़ो सामान को ख़त्म करने में लगाया।
बस क्या बताऊँ की कितना आनंद आया....
यात्रा हमेशा बहुत से अनुभव देकर जाती है, हम भी अपने अपने अनुभवों के साथ ट्रेन पर सवार हुए, और बतियाते बतियाते कब खाये पिए और कब सो गए पता ही नहीं चला।
और सुबह सुबह दिल्ली आ गए...
इस वादे के साथ की यात्राएं चलती रहेंगी सभी को नमन