Friday, 7 October 2016

दक्षिण यात्रा....एक स्वप्न जो पूरा हुआ। भाग-1 (यात्रा से पहले)



दक्षिण यात्रा से पहले और यात्रा वाले दिन की कहानी 😊

ये यात्रा महज एक यात्रा नहीं रही, यह एक सपना थी, मेरा वो सपना जो हक़ीक़त बनके मेरे सामने आया। और आया भी अचानक, बिना किसी पूर्व नियोजन (planning) के।

दक्षिण घूमने का मन कई बार हुआ, यूँ तो एक बार बैंगलोर की ट्रेन की टिकट्स भी करवा लीं थी इस वर्ष पर किन्हीं विशेष कारणों के चलते वो आरक्षण रद्द करवाना पड़ा।

ख़ैर 25 अगस्त 2016 के दिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में सरकारी अवकाश था, और अक़्सर छुट्टी वाले दिन भी घर में न रहने वाला रवि यानी मैंने सोचा की यार आज कहीं नहीं जाऊँगा।

सुबह से बिना नहाये धोये लेटा हुआ रेडियो पर गाने सुनता हुआ आलस को अच्छे से महसूस करते हुए, मोबाइल उठाया, और फेसबुक पर लॉगिन किया, और जैसे ही FB खुला सामने स्पाइस जेट की सस्ती हवाई टिकट्स ऑफऱ दिखा।

न जाने अंदर से आवाज़ आई की रवि चल। करवा ले बुकिंग।

पैसों की समस्या ने भी ठीक उसी समय आलस में ही सही पर बड़ा सा मुँह बाया और जैसे चिढ़ाया मुझको।

तभी दिमाग के घोड़े दौड़ते हुए क्रेडिट कार्ड का उपाय साथ लेकर आये। और मुझे जैसे बावरापन सा सवार हो गया।

यात्रा का अचानक ऐसे विचार आना और तुरंत उसपर अमल करने में अक़्सर मैं किसी से पूछता नहीं, फिर भी जाने मन हुआ की अपने एक अभिन्न मित्र से पूछ लूँ।

ख़ैर साहब उनको फ़ोन लगाया, अपना सब प्लान बताया कि कैसे मैं 9 सितंबर 2016 दिन शुक्रवार शाम को निकलने का सोच रहा हूँ दिल्ली से और 18 सितंबर की वापसी का समय तय किया है।

9 सितंबर को जाने का तय करने के पीछे एक कारण था, 10 को महीने का दूसरा शनिवार था, जो अवकाश रहता है।
फिर रविवार, उसके बाद 12 को ईद के मौके पर सरकारी अवकाश।

इन 3 दिनों का सदुपयोग करना चाहता था आगामी यात्रा के लिए।

पर साहब जिसका भय था वही हुआ, उस मित्र ने अपनी ड्यूटी के चलते दिल्ली से निकलने के दिन को आगे बढ़ाने की बात कही, जो की संभव नहीं था।

मैंने सोचा की चेन्नई की बुकिंग करवाऊंगा, और इसको बोलता हूँ की तू उसके दो दिन बाद कन्याकुमारी मिल।

पर सोचा हुआ अक़्सर तब नहीं होता जब उसको करने न करने में कोई और भी शामिल हो।

बात नहीं बनी, एक बार फिर से हमेशा की तरह मुझ अकेले की यायावरी के मार्ग बन गए 😊

श्री कृष्ण को यही मंजूर था कि उनके जन्मदिवस के पावन मौके पर मेरे घूमने का नियोजन हो, और हुआ, टिकट्स हो गईं।

मन बल्लियों उछल रहा था

जाने की टिकट दिल्ली से चेन्नई तक करवाई

वापसी की बैंगलोर से दिल्ली, एक अर्ध वृत्त बनाया घूमने के लिए।

चेन्नई से कन्याकुमारी, कन्याकुमारी से त्रिवेंद्रम, त्रिवेंद्रम से मुन्नार, मुन्नार से मैसूर, मैसूर से बैंगलोर और बैंगलोर से दिल्ली को 18 सितंबर 2016 को वापसी।

चेन्नई घूमने का मन नहीं था, किन्तु मथुरा भैया (चाचा जी के छोटे बेटे) से मिलने का बहुत मन था। वो वहीँ पर जॉब करते हैं।

9 सितंबर को शाम 6 बजे की फ्लाइट थी, भैया ने 15 मिनट में एयरपोर्ट छोड़ा दिया 😊।

6 बजे की फ्लाइट अपने समय से उड़ी, ये समय बड़ा मायने रखता था मेरे लिए, क्योंकि ऐसे समय में आसमान की ऊँचाइयों से सूर्यास्त देखने का मौका मिलता है।

बोर्डिंग पास लेने के वक़्त हमेशा की तरह एयरलाइन्स वालों से प्रार्थना की खिड़की वाली सीट दे दो।
हवाई यात्रा कई बार कर चुका हूँ, किन्तु खिड़की की तरफ बैठना और जहाज़ से बाहर निहारना हमेशा ही अच्छा लगता है।

मेरे कुछ जानकार और मित्रों कहना है कि उन्होंने इतनी यात्राएं कर ली हैं कि अब मन नहीं होता खिड़की से झाँकने का।
ख़ैर उनका मन है, जैसा महसूस करें।

पर मुझमें वो बच्चों जैसी जिज्ञासा और उत्सुकता सदैव रहती है, जिसके चलते मैं ऐसा करता हूँ। हम रोज ही रात को तारों भरा आकाश देखते हैं, और दिन में बादलों के खेल, वो भागाभागी करते, अजब गजब चित्र बनाते हुए, क्या कभी इनसे मन ऊबता है????

ऊबता होगा किसी का, मुझे बहुत भाता है।

नीला आसमान, नीचे बादलों के सुन्दर कालीन दिन में, गहरा अँधेरा, काली चादर में चाँदी की जरी से सितारे रात में आसमान पर, और शहरों कस्बों की टिमटिमाती रौशनियाँ दूसरे आकाश का आभास सा करवाती हुई हवाई यात्रा में कोई कैसे न खिड़की पर बैठे।

मुझसे नहीं होता कि ये प्रकृति और विज्ञान के मिलन से उत्पन्न सुन्दर संयोग में मोबाइल या लैपटॉप पर कोई मूवी देखूँ, गाने सुनूँ या गेम खेलूँ।

ख़ैर मुझको खिड़की की सीट मिल जाती है हर बार 😊😊😊

इस बार भी मिल गई
और मैं खो गया उस आसमान में, वो दूर अपने बराबर या नीचे क्षितिज पर सूर्य को अस्त होते हुए देखना, और सूर्यास्त के बहुत बाद तक रौशनी के वो खेल, बादलों के संग मिलके जैसे किसी चित्रकारी प्रतियोगिता का आयोजन करना आसमान का.....उफ़्फ़

कैसे लोग जो ऊब गए हैं। उनको खुद से प्रश्न करना होगा, जी रहे हैं क्या मरने से पहले या रोज रोज मर रहे हैं मरने से पहले???

फ्लाइट दिल्ली से 6 बजे चलकर 8:30 पर चेन्नई पहुँच गई।
सुन्दर एहसास चेन्नई शहर को रात के अंधेरे में टिमटिमाता हुआ, झिलमिलाता हुआ, झगमगाता हुआ देखना।

कुछ तस्वीरें:



ऐसे जैसे धूप खुद से आई हो होंठों को छूने

चेन्नई शहर रात की चादर में जैसे किसी ने सुन्दर ज़रदोज़ी की हो


 



चेन्नई हवाई अड्डे के अंदर