Friday, 24 November 2017

ज़माने का साथ (होड़) अनुभव...नया बैग औऱ कपड़े

वैसे तो मैं झूठ भी बोलता हूँ, पर यह पोस्ट सत्य और स्व-अनुभव पर आधारित है, और पकाऊ भी हो सकती। 😊

1 मई 2001 (विश्व मज़दूर दिवस) को मैंने MTNL जॉइन किया, मने नौकरी में आया, नौकरी में आने का कारण सौभाग्य और दुर्भाग्य के समानांतर चलने की वजह से हुआ। जिसपर मैंने कभी अधिक सोचा विचारा नहीं। जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया.... गाने की तर्ज़ पर।

ख़ैर भैया ने बड़ा समझा के भेजा, ऐसे व्यवहार रखना है, वैसे व्यवहार रखना है, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करना, ख़ुद में रिज़र्व नहीं रहना...मेरे मार कुटाई वाले इतिहास के मद्देनज़र जो जो बातें वो समझा सकते थे कह दिए। कार्यालय जो कि जनपथ होटल की पहली मंजिल पर था, हालांकि सामने ही हमारा मुख्यालय था, पर उस सरकारी 5 सितारा होटल में किराए की जगह पर कार्यालय था मोबाइल सेवा मने बेतार सेवा का। यह पहला अनुभव था किसी इत्ते बड़े होटल में घुसने (प्रवेश) करने का। घुसते ही ठंडा ठंडा मौसम किसी हिमालय की पहाड़ी सा, भीनी भीनी खुशबू पूरी लॉबी में, बहुत करीने से साफ़ सुथरे अच्छे लिबास में लड़के और लड़कियाँ वहाँ के एम्प्लोयी थे शायद, उनके चेहरे की मुस्कुराहट हमेशा एक सी बनी रहती, मुझे बहुत अच्छा लगता, बहुत दिनों बाद समझ आया यह होटल इंडस्ट्री की ट्रेनिंग मने अभ्यास का नतीजा है, जो भी हो मुस्कुराते रहो शोरूम के पुतलों की तरह।

ख़ैर लॉबी में बहुत सुंदर संगीत धीमी आवाज़ में बजता था, इतना धीमा कि लगता था कहीं आसपास बज रहा है, पर कहाँ यह जान नहीं पाया कभी। इससे पहले मैंने मटकों में स्पीकर रख टेप-रिकॉर्डर को कई बार झनकार बीट्स वाला म्यूज़िक सिस्टम बनाया था, पर इस संगीत की बात ही कुछ और थी।

पहले हफ़्ते बड़ी झिझक रही, जब जब होटल की लॉबी में प्रवेश करता, संकोच रहता, कि कहीं से कोई टोक न दे, अबे कहाँ जाता है, अपने पहनावे से कभी मुझे झिझक न होती पर ऐसी जगहों पर जाने का अभ्यस्त भी न था, आज भी नहीं हो पाया हूँ।

तब ऐसी जगहों पर प्रवेश के सुरक्षित अधिकार के बारे में पता न था, आज पता है, पर ज़्यादा कुछ बदला नहीं, आज भी झिझकता हूँ। ख़ुद को उतने महँगे माहौल के लिए उपयुक्त पात्र नहीं मानता।

एक सप्ताह में मन औऱ मस्तिष्क दोनों अभ्यस्त हो गए उस जगह के, चेहरे जाने-पहचाने से हो गए, दुआ सलाम भी होनी आरम्भ हो गई, गार्ड भी सलाम ठोंकने लगे, तब भी ऐसे किसी से सलाम सैल्यूट की आदत न थी, असहज हो जाता था, आज भी असहजता घेर लेती है, पर आज इंसान की तरह अच्छे से अभिवादन करता हूँ, पूरी कोशिश रहती है सैल्यूट करने वाले के नाम को याद रखूं और जी लगाना न भूलूँ।

21 साल का था मैं, शादी मेरी 1 साल पहले मने 20 वर्ष की आयु में हो गई थी, बालविवाह का कारण पिताजी के गले का कैंसर था, आख़िरी अवस्था का। जैसा कि हमारे जैसे प्रत्येक परिवार में सोचा जाता है कि बड़े-बूढ़ों के रहते विवाह संस्कार हो जाये, मेरे लिए भी वैसा ही सोचा गया।

संयुक्त परिवार के चार भाइयों, औऱ 3 बहनों में सबसे छोटा मैं ही था, बाक़ी सबका विवाह बाबू जी और चाचा जी करवा चुके थे।

21 साल की उम्र का मतलब था मुझे किसी भी प्रकार के अनुभव का बहुत अल्प ज्ञान, न पहनने ओढ़ने का सलीका (जो आज भी नहीं आया), न कार्यालय पद्धति का ज्ञान, बोलचाल भाषा प्रयोग, कुछ नहीं। सब सीखा, मुझे अच्छे लोग बहुत मिले, फिर चाहे मेरे इकाई अधिकारी हों, या मेरे वरिष्ठ सहकर्मी, सभी ने मुझे सिखाने में कोर-कसर बाक़ी न रखी।

पर सीखने की प्रक्रिया तो मेरे दिमाग़ में भी सतत चल रही थी। मैं जहाँ से जो होता सीखता जाता था, अच्छा बुरा-सोचने का अवसर और ज्ञान नहीं था। यहाँ से दुनिया को देखने की आदत सी पड़ती गई, इससे पहले दुनिया शायद मुझे देखती थी, शायद, पर अब मैंने दुनिया को देखना आरम्भ कर दिया था।
पर कमाल यह था न दुनिया ने यह जाना, न मुझे इसका एहसास हुआ, कि मैं दुनिया को देख-देख, कुछ-कुछ सीख रहा हूँ।

उसी सीखने का नतीज़ा यह हुआ कि मैं सोचने लगा कि ऐसे कपड़े पहनने चाहिए, ऐसी बेल्ट हो, जो पेन मैं पैंट की पीछे वाली जेब में रखता था हमेशा पर्स के संग अब वो मेरी कमीज़ की जेब में पहुँच चुका था, मैं क्लर्क बन गया था भई, 9000 रुपये, 2001 में तनख्वाह मिलने वाली थी।

बड़ी ख्वाहिशें कि ऐसे जाएँगे बनके ऑफिस, एक लाल रंग का फ़ोल्डर टाइप बैग था, बाबू जी का दिया हुआ, आज भी है, उसी बैग को रोज़ बग़ल में दबा कार्यालय जाना, Blue Lineबसों, तो कभी DTC बसों के पीछे दौड़ लगाना, और ड्राइवर का एहसान से करके कभी कभी बस स्टैंड पर रोक देना, और जनपथ के अपने उस कार्यालय पहुँच कर पहले पसीना सुखाना, बाल सही करना, जूते जो काले से मटमैले हो चुके होते थे उनको पैंट ऊपर करके ख़ुद की जुराबों से पोछना, न जाने क्या क्या सीखता जा रहा था।

फ़ोल्डर टाइप के बैग के दिन कुछ दिन में पूरे हो गए, मने अब मुझे कुछ और बेहतर, ज़माने के हिसाब से चाहिए था, कदम से कदम मिलाने का मन था, जनपथ में कार्यालय होने के चलते CP, शंकर मार्किट, पालिका बाज़ार जाने पर महसूस होता था कि दुनिया बहुत आगे और मैं बहुत पीछे था, मुझे अपनी गति बढ़ानी थी, गति बढ़ाने के लिए जो मैंने सीखा वो यह कि पुराने से बैग से गति नहीं बढ़ेगी, नये ज़माने का बैग लेना होगा, जी तो मैंने भी शंकर मार्किट के फुटपाथ से बैग ख़रीदा, अब  भी गति नहीं मिली, कुछ कपड़े कमला नगर मार्किट से लिये, ताकि कदम से कदम मिला लूँ, जैसे तैसे संकोच के संग नए कपड़े पहन मैंने चलना सीखा उस भीड़ में, भीड़ का हिस्सा होने के लिए, आगे नहीं, साथ चलने के लिए। आगे निकलना मेरा कभी भी मक़सद न रहा

Friday, 15 September 2017

अंडमान यात्रा, प्रथम अध्याय



8 जुलाई 2017 की सुबह दिल्ली के T3 terminal ठीक 7:31 पर विस्तारा का हवाई जहाज उड़ गया कोलकाता के लिए, और दिल्ली दूर होती चली गई।

सुबह के 9:26 जहाज ज़मीन पर उतरा, कोलकाता के हवाई अड्डे को पहली बार देखा। कोलकाता में कोई रुचि न थी, मन में अंडमान के द्वीप घूम रहे थे। पहली बार इतनी ऊँचाई से गहरे सागर से घिरे हुए द्वीपों को देखने की इक्षा इतनी प्रबल थी कि कोलकाता एयरपोर्ट पर रुकना पल पल भारी सा लगा।

कोलकाता हवाई अड्डे से फ्लाइट ठीक 10:27 पर उड़ चली। अभी तक मुझे खिड़की वाली सीट न मिली थी, मने दिल्ली से कोलकाता का सफ़र बस पढ़ते हुए बीता। कोलकाता से उड़ान भरने से पहले ही मैं खिड़की को तरफ़ बैठ गया, ये सोच कर की कोई आएगा तो उठ जाऊँगा। अपनी इस सोच पर हँसी आई। जैसे बस में सफर कर रहा होऊँ 😀, ख़ैर शुक्र ये रहा कि कोई आया नहीं, औऱ लोगबाग भी कम ही रह गए थे, कोलकाता से कुछ लोग ही चढ़े थे।
मैं फ़िर से उड़ चला था अनजाने द्वीपों की तरफ़। अभी द्वीप आने में देर थी, अपने अगल बग़ल ध्यान दिया, एक सीट छोड़ कर, एक भाई दिखा, एकदम स्टाइलिश, मतलब मैं 80 के दशक की उपज, तो तो 90 का, मेरी जवानी जा चुकी है, उसकी आ रही थी। कपड़ों से एकदम ढिंचाक। नए ज़माने की P कैप, उसपर मस्त स्टाइल वाले गॉगल्स, पल में ही सोच लिया, कि भैया अपना मेल नहीं।
फिर थोड़ी देर में ही खाना पीना देना शुरू किया विस्तारा वालों ने, मुझे लगा कि दिल्ली कोलकाता के बीच मुझे खिला चुके हैं, अब मेरा नंबर नहीं लगेगा, जो लोग कोलकाता से चढ़े हैं उन्हीं को मिलेगा भोजन पानी, अपनी इक्षाओं को खिड़की की तरफ़ मोड़ दिया, उस तरफ़ देखना भी नहीं चाहता था जहाँ सब भकोस रहे होंगे, और मैं नहीं।

मेरे कानों में मिश्री घुली उसी वक़्त सर व्हाट वुड यू लाइक टू हैव, वेज नॉन वेज...हैं....यक़ीन नहीं हुआ, ऊपर से अंग्रेजी बोलती हुई सुंदर स्त्री, समझ से परे था मुआमला, पर हिम्मत जुटा कर खिड़की से नज़र उसकी नज़रों की तरफ ले गया, जी कुछ कहा, मेरे हुक्के से मुँह को देख समझ गई, देसी है। सर आप क्या खाना पसंद करेंगे, कुछ भी, बस नॉन-वेज न हो, वो क्या समझी, क्या सोचा बिना इसको जाने मैंने पूछा क्या है, उसने अंग्रेजी में जो बड़ा बड़ा सा बोला, मैं समझा क्या मस्त चीज़ होगी यार।

थोड़ी देर में आलू की टिक्की, और सफेद वाले मटर वाली सब्ज़ी के संग पैक्ड अवस्था में दे गई, और भी बहुत कुछ साथ था, सबकी क़्वालिटी बहुत उम्दा थी, स्वादिष्ट भी, पर मन में ख़याल थे कि भाई सीधा सीधा आलू की टिक्की भी तो बताया जा सकता था।
ख़ैर दुनिया की माया, अपुन समझ न पाया।

खाना पेट में अच्छे से पहुँच गया, जब ये पक्का हो गया, तो हाथ धोने का मन हुआ, उठा, और उस जवान लड़के से एक्सक्यूज़-मी के संबोधन से बात आरम्भ हुई, कि भाई जगह दो, हम वाशरूम हो आएँ।
वापस आने पर नौजवान को सॉरी बोला, क्योंकि उसके कानों में earphone लगा हुआ था, ज़ाहिर है मेरी आवन-जावन से उसके संगीत में ख़लल पड़ी थी, पर मेरे सॉरी को बड़ी विनम्रता से स्वीकार करके उसने अपने स्वभाव के अच्छे होने का पहला परिचय दिया।

नाम सूरज बताया उस लड़के ने, पूरा नाम B. Suraj, पहला प्रश्न, अंडमान घूमने जाते आप?? हाँ, दूसरा प्रश्न: अकेले?? हाँ, इस दूसरे प्रश्न के उत्तर को थोड़े मुश्किल से हजम किया भाई ने, अब भला दिल्ली से अंडमान जैसी दूरस्थ जगह कोई अकेले जाता है, जाता है भाई, घुमक्कड़ फक्कड़ जाता है।

पहले दूसरे प्रश्न के बाद इधर उधर से सवालों की बौछार हुई और अंजाने-पन भाई का वध हो गया उसी बौछार से। अबतक वो मेरे बारे में, मैं उसके बारे में बहुत कुछ जान चुके थे। वो सबकुछ जो यहाँ इस फेसबुक जैसे मंच पर जानने में कई साल लग जाते हैं कभी कभी।

टूर मैनेजर हैं भाई, पता चला, लो जी, जानकारियाँ ले लो, मन में आया, फिर लगा कि यार मैं घुमक्कड़ी करने निकला हूँ, घुमक्कड़ हूँ, पर्यटक बनने का काहे सोच रहा हूँ?? ख़ैर कई जानकारियाँ मिलीं। बहुत मिलनसार, मददगार स्वभाव का लड़का है। स्टाइल से नहीं लगता था। इसलिए कहा गया है पूर्वाग्रह ठीक नहीं अधिकतर 😊♥😊

#पिक्चर_अभी_बाक़ी_है_दोस्तों .......