दो साल पहले बच्चों को शिमला घुमाने ले गया, शिमला जाने का कारण बस इतना था कि दिल्ली से सबसे कम दूरी पर किसी पर्वतीय स्थान तक रेलगाड़ी से आवन-जावन की सुविधा, BSNL के इंस्पेक्शन क्वार्टर में 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मस्त ठहरना, औऱ बच्चों के लिए toy train की मनोरंजक यात्रा। उस यात्रा से पहले यह सोचा तक न था कि कभी बड़ोग वापस आना होगा, जो कि यात्रा पूरी होने तक निश्चित कर लिया था कि बड़ोग तो आना ही होगा। क्यों?? आगे पढ़िए
कालका शिमला यात्रा में बड़ोग से जब ट्रेन गुज़री तो इस स्टेशन की सुंदरता ने मन मोह लिया, लूट लिया भरी दोपहरिया में। फिर स्टेशन के बारे में जानकारी तलाशी अंतरजाल मने इंटरनेट पर तो पाया कि एक थे कर्नल बरोग, जो अंग्रेजों के जमाने के इंजीनियर थे, इनको अंग्रेजों ने सुरंग खोदने का काम सौंपा, कर्नल बरोग ने पहाड़ के दोनों तरफ निशान लगा खुदाई करवाई, औऱ ग़लती से मिस्टेक ये हो गई कि टनल कहीं औऱ निकली, मने रूट से अलग, अंग्रेज तो ठहरे अंग्रेज, वो किसी के सगे न थे, उन्होंने अपने ही कर्नल बरोग पर उस ज़माने में 1 रुपये की भारी पेनल्टी मने ज़ुर्माना लगा दिया। इत्ते बड़े इंजीनियर पर 1 रुपये का भारी ज़ुर्माना, ऊपर से मजूरों की भी हा-हा, ही-ही, खुसर-पुसर कि साहब की वजह से मेहनत बेकार गई, अपने कर्नल बरोग भाई भी भोत बड़े वाले खुद्दार आदमी थे, ये सब बेइज़्ज़ती झेल न पाए औऱ एक सुबह अपना कुत्ता टहलाने निकले, औऱ कभी वापस न आये। अपनी पिस्तौल से ख़ुद को गोली मार ली, कुत्ते के अलावा किसी ने ऐसा होते नहीं देखा। खून से सनी उनकी लाश बरामद हुई। कर्नल बरोग जी को उसी अधूरी टनल के सामने ही सुपुर्दे ख़ाक कर दिया गया।
बरोग जी की मृत्यु के बाद सन 1900 में टनल पर फिर से काम शुरू हुआ और 1903 में टनल पूरी तरह तैयार हो गई। उस सुरंग का नाम कर्नल बारोग के नाम पर ही बरोग टनल रखा गया, जहाँ पर आज बड़ोग स्टेशन है, बरोग से बड़ोग के सफर की जानकारी मुझे नहीं, न इच्छा है। ज़्यादा तकनीकी न होकर बस इतना बताना है कि सुरंग नंबर 33 दुनिया की सबसे सीधी टनल मानी जाती है जिसकी लंबाई 1143.61 मीटर है, मने 1 किलोमीटर से भी अधिक। इस छोर से उस छोर की रौशनी देख सकते हैं आप (उदाहरण के लिए नीचे वाली तस्वीर देखिये)।
लोकल लोगों औऱ इंटरनेट की बातें मानी जाएँ तो आज भी
कर्नल बरोग की आत्मा घूमती है यहाँ, औऱ रात में सुरंग के अंदर से कराहने की आवाज़ आती है। इतनी लंबी सुरंग में अंदर पहाड़ का पानी रिसता रहता है, अगर रौशनी न हो तो खुद की साँसों की आवाज़ से ही डर जाए कोई। ऐसा पढ़ने औऱ सुनने में आया कि इस टनल के अंदर कुछ दूर चलने पर एक सुरंग है। सरकार ने उस सुरंग को बंद करने के लिये लोहे का दरवाजा भी लगाया, लेकिन एक दिन लोगों को दरवाजे का ताला टूटा मिला। तब से लेकर आज तक उसमें ताला नहीं डाला गया। (मैंने तो अंदर जाकर चेक भी नहीं किया 😀)
एक रात 11:30 से 12 के बीच मैंने कोशिश की सुरंग में जाने की, पर मेरे पास किसी प्रकार का औज़ार या हथियार नहीं था, भूतों से तो डर जैसा कुछ है नहीं (कहना पड़ता है), पर इतनी लंबी सुरंग में रात को कोई जानवर भी हो सकता था, कुछ भी, भेड़िया, तेंदुआ जंगली कुत्ता, साँप या मेरा ख़ुद का भय आदि। इसलिए सुरंग के इस छोर के बाएं तरफ से पहाड़ी स्त्रोत का ठंडा पानी बोतल में भरा, थोड़ा सा अंदर जाने के अरमानों पर डाला औऱ वापस अपने कमरे में आ गया।
अब आते हैं मेरे अनुभव पर:
बड़ोग रेलवे स्टेशन कालका से शिमला वाले रूट पर कुमारहट्टी के बाद औऱ सोलन से पहले पड़ता है। ये स्टेशन कितना सुंदर है ये वहाँ जाकर ही जाना जा सकता है। भीड़-भाड़ से अलग, एकदम शाँत जगह। कालका से सोलन वाली बस से भी जाया जा सकता है, बड़ोग कस्बे से 4 kms आगे उतारेगा बस वाला स्टेशन के लिए, ऊपर सड़क से 5-10 मिनट में नीचे उतर कर है ये स्वर्ग। यहाँ रेलवे के हॉलिडे होम हैं, मुझे स्टेशन मास्टर ने शिवालिक डीलक्स दिया, जिसका किराया 750 प्रतिदिन था। कमरे का आकार, सफ़ाई, औऱ अंग्रेजों के ज़माने की बनावट के हिसाब से 750 रुपये बहुत कम लगे। स्टेशन मास्टर मने बड़े बाबू ने एक बात बताई कि ऑनलाइन बुक करवाने से 1 नम्बर वाला कमरा मिलता है, जिसका किराया 300 रुपये प्रतिदिन है, 2 लोगों के लिए, 3 लोग भी ठहर जाते हैं, घर जैसी बात है। अगली बार आप वही करवाना, औऱ हाँ जो शिवालिक डीलक्स कमरा आपको दे रहा हूँ उसको पाने के लिए सब तरसते हैं, वाह जी वाह, बिन माँगें मोती मिल गए।
2 रातें यहाँ बिताईं, औऱ 2 दिन पड़ा रहा इसी स्टेशन पर यहाँ वहाँ, कइयों से मित्रता हुई, औऱ बहुत देर तक स्टेशन मास्टर जी के कक्ष में बैठ रेलवे की कार्यप्रणाली देखी। देखा कैसे स्टेशन मास्टर जी सभी कार्य तल्लीनता से अपना समझ करते हैं, चाहे वो टिकट बनाना हो, या सिग्नल भेजना, फ़ोन अटेंड करना, या साफ सफाई करवाना या करना या कुत्तों को भगाना, सभी कार्य बिना किसी परेशानी औऱ झुंझलाहट के, जाने इस जगह का असर था या स्टेशन मास्टर होते ही ऐसे हैं।
दिल्ली जैसी जगहों की गर्मी औऱ भीड़भाड़ से दूर एक ऐसा मनोहारी रेलवे स्टेशन जहाँ पहुँचना बहुत ही आसान है। औऱ गर्मी औऱ उमस के इस मौसम में यहाँ जाने के लिए आपको गर्म ऊनी कपड़ों का बोझ लेकर नहीं जाना पड़ेगा। यहाँ धूप में रहेंगे तो थोड़ी गर्मी लग सकती है, इसके अलावा पूरे स्टेशन पर कहीं भी, किसी छाया में बैठ सारा दिन आप अपनी मनपसंद किताब पढ़ सकते हैं।
50 रुपये की खाने की थाली में 4 या 5 रोटी, सब्जी, दाल चावल, अगर दोपहर में थाली खाने का मन न हो तो वेज बिरयानी ये भी 50 रुपये में, उम्दा स्वाद, सुबह नाश्ते में वेज कटलेट या ऑमलेट ब्रेड कॉफ़ी के संग, वो भी 50 रुपये में।
दिन में जब चाहो सामने 2 नंबर platform से छोले कुलचे, या छोले भटूरे खा सकते हैं। औऱ हाँ, पानी वही पहाड़ी स्त्रोत वाला, सुरंग के इस छोर के बाएँ तरफ, जितना चाहो, उतना भर भर पियो, ठंडा, पहाड़ी मिनरल से भरपूर पानी, वो भी मुफ़्त ☺️।
अकेले या परिवार के संग जाने के लिए बेहतरीन जगह, मैं चार किताबों, कैमरा औऱ मोबाइल के संग गया था। जिनको कुछ भी न करने का शौक़ हो, जो बिना वीडियो गेम खेले, बिना TV के घंटों पड़े रह सकते हैं उनके लिए यह जगह स्वर्ग है। औऱ हाँ अगर पड़े पड़े हाथ पैर अकड़ जाएँ तो या तो सुरंग से होकर कुमारहट्टी की ओर घूम आइये, या सोलन की तरफ रूख़ कर लीजिए, हल्की फुल्की ट्रैकिंग करने का मन हो तो 1.7 kms चढ़कर वो जगह देख आइये जहाँ कर्नल बरोग जी की सुरंग गलत दिशा में निकल गई थी, बरोग जी भी वहीं आराम कर रहे हैं अपनी कब्र में।
डिस्क्लेमर
मुझे किसी भी तरह की कराहने की आवाज़ या अजीब आभास नहीं हुए, न ही किसी आत्मा वात्मा का एहसास हुआ, वैसे मैं रात के समय तो क्या, दिन में भी सुरंग में नहीं गया, परंतु रात में कई बार उठ उठ कर बाहर बालकनी में आने पर पास में बहते पानी की आवाज़ के बावजूद एक अजीब सी शाँति को महसूस किया, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए शब्द नहीं हैं।
आपको ख़ुद जाना होगा टनल नंबर 33 जिसे बड़ोग टनल के नाम से जाना जाता है।
कुछ तस्वीरें:
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