Thursday, 8 October 2015

अवलोकन: काहे की जल्दी है?

अवलोकन

स्थान: कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन
दिनांक: 8 अक्टूबर 2015
समय: शाम 6:30 के आसपास
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दिल्ली शहर भी बहुत तेजी के साथ चलने की आदत डाल रहा है, कुछ लोग कह सकते हैं की बहुत फ़ास्ट है जी...
मेट्रो स्टेशन हो या सड़क हर तरफ अफ़रातफ़री सा माहौल देखने को मिल जाएगा।

कहीं कोई किसी के रास्ते में आने पर मुँह बना रहा है, कहीं किसी के कंधे टकराने से चलने में बाधा आ जाती है, कहीं किसी की टक्कर से किसी के हाथ से मोबाइल गिरते गिरते बचा, शुक्र है ज़िन्दगी बची वाला भाव चेहरे पर दिखता है, कहीं कोई मेरी धीमी गति की वजह से मुझे धकियाते हुए बुदबुदाता हुआ कि फुरसत में है बावला 😄

हर 2 मिनट में नहीं तो 5 या 7 मिनट में अगली मेट्रो आ जाती है सामान्यतः,  पर सभी अजीब सी दौड़ का हिस्सा बने हुए से हैं।
यदि सुबह का समय हो तो समझ में आ सकता है कि हर किसी को अपने कार्यस्थल पहुँचने की जल्दी है पर शाम को भी यह आलम....उफ़्फ़ तौबा है

घर ही तो जाना है, कौन सी हाज़िरी लगानी है? पर नहीं कान में मोबाइल फ़ोन का लीड लगाए सभी डॉ से बदहवास फिरते हैं। अरे थोड़ा ठहर के चल लो भाई,  शायद जीवन अच्छा सा सा लगने लगे, विराम दो, जल्दी काहे की?

घर भी जाकर तुम्हें बुद्धू बक्से (टेलीविज़न) के आगे बुद्धू ही बनना है।
पता नहीं शायद मैं ही जीवन में बहुत धीमा हूँ। खैर...

पागल मन की बातें 

Monday, 5 October 2015

अफ़सोस:
4 अक्टूबर 2015, शाम का वक़्त
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आर के पुरम अपने घर जाने के लिए दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन से मेट्रो ली, हमेशा की तरह अंतिम कोच के अंतिम से पहले वाले दरवाज़े से प्रवेश करके बाईं तरफ की दो सीटें जो वृद्ध और विक्लांगों के लिए आरक्षित होती हैं उनसे एक सीट हट कर मैं बैठ गया।
बैठने पर एक विचार हमेशा की तरह मेरे स्वार्थी मन में आया की कोई मुझसे ज्यादा जरूरतमंद (सीट के लिए) मेरी नज़रों के सामने न आये। वरना एक बड़े परिवार के सबसे छोटे सदस्य और प्यारी सी बिटिया के बाप का बावला मन उसको सीट दे देगा। पर नियति ने अपना खेल खेला। मेरी दाहिनी तरफ जो आरक्षित सीटें थी उसमें से एक पर एक 14 या 15 साल की लड़की अपने 1 साल के भाई को गोद में लेकर बैठी थी और वो दुनिया की चालबाजियों से बेखबर सो रहा था। उसकी माँ शायद विकलांग और वृद्ध श्रेणी के आरक्षण के चलते नहीं बैठी थी। बस अपनी बिटिया को बिठा दिया कि छोटा बालक उसकी गोद में चैन से सो पायेगा। महिला की उम्र 35 के आसपास रही होगी।
खैर तभी एक 50 के अंदर उम्र वाली महिला शाहदरा स्टेशन पर मेरे ठीक सामने आकर खड़ी हो गई। एक बची आरक्षित सीट भी घिर चुकी थी।
वो महिला ऐसे मुँह बना रही थी जैसे 65 साल की आयू वाले व्यक्ति को खड़े होने में दिक्कत होती है। मन बावला पसीजा और मैं खड़ा हो गया की आंटी जी बैठ जाओ।
बैठते ही उसने अपने उन सभी संसाधनों को ठीक किया जिनसे उसकी उम्र का हिसाब लोगों को धोका दे सके।

फिर उसकी विस्तारवादी नीति का खुलासा हुआ। उसने आवाज़ लगाईं अपनी बिटिया को जो की नवविवाहिता जान पड़ी। मेरे बगल में जो सज्जन थे वो भी उसकी बिटिया के लिए खड़े हो गए।
अब एक महिला और जो उन्हीं के साथ थी उम्र 40 के नीचे वो भी अवतरित हुई। जिस 50 के लपेटे वाली महिला को मैंने सीट दी थी उसने मेरी दाहिनी तरफ बैठी उस 14 या 15 साल की बच्ची जो अपने 1 साल वाले भाई को गोद में सुलाये संभाले बैठी थी को धकियाना शुरू किया और एडजस्ट करने को कहा उस 40 साल वाली महिला के लिए।
सोते हुए बच्चे की माँ ने जो खड़ी ये सब देख रही थी ने विनम्रता से कहा की बच्चा सो रहा है ज़रा ध्यान से।
उस 50 साल के लपेटे वाली महिला ने अपना भद्दा मुँह खोला और बोली "क्या हुआ जो बच्चा है थोड़ा दब ले"
मैं बता नहीं सकता की कितना अफ़सोस हुआ। मन में आया की कहूँ कि आंटी एक छोटे बच्चे के लिए इतनी संवेदनहीनता, और ऐसे शब्द का प्रयोग करके आपने मुझे अफ़सोस करने पर मजबूर कर दिया की आप जैसे को सीट क्यों दी......
पर कुछ कह न सका दिल्ली का यह आम व्यक्ति वो भी पुरुष। शुक्र है ISBT आ गया तब तक, और इंटरचेंज के लिए मैं उतर गया वरना न जाने कब तक अफ़सोस और आत्मग्लानि होती.....


पागल मन की बातें

बेवकूफ़ी

एक बार मैंने भयानक बेवकूफी की। बाइक से निकल लिया घूमने।
सुबह 7 बजे दिल्ली यूनिवर्सिटी से निकला था सोच कर की जहाँ थक जाऊँगा रुक जाऊँगा। सारे दिन अपनी बजाज एवेंजर पर चलता रहा, पानीपत और अम्बाला रुका चाय पानी और लस्सी के लिए।

शाम को 7:30 के करीब पठानकोट पहुँचा, सोचा यहीं कहीं कमरा लेकर रुक जाऊं। खैर खाना खाया फिर मन किया की आगे पहाड़ों की तरफ चलूँ।
2 अक्टूबर का दिन था और रामलीलाओं के दिन थे। पठान कोट से चल दिया। थोड़ी थोड़ी दूर पर गाँव क़स्बे मिलते तो वहाँ की रौनक रामलीलाओं की मन को मोहती और बचपन की यादें ताज़ा हो जाती।

खैर रात 12 के करीब Dalhaousie पहुँचा। 200 रूपए में कमरा लिया। और कम्बल तान सो गया।

अगले दिन 9 बजे जागा। फ्रेश होकर चाय पी और निकल पड़ा। Dalhaousie में कोई खास रूची न थी तो चम्बा और खजिहार के रास्ते हो लिया।

चलता गया चलता गया तकरीबन 30 या 40 kms चला तो रास्ते में भलेई माता, भद्रकाली के मंदिर के बारे में पता चला।

ऊंची पहाड़ी के शिखर पर भव्य मंदिर है। माता सोने के गहनों से ढकी हुई थीं। कोई खास सुरक्षा नहीं। कहते हैं एक बार पुराने समय में किसी ने चोरी की कोशिश की थी। चोर अंधे हो गए और पकड़े गए।

बहुत शान्ति मिली वहाँ बैठ कर। भंडारे का आयोजन था क्योंकि नवरात्रे थे। दबा कर कढ़ी चावल खाये।

वहीँ से वापस हो लिया Dalhaousie की तरफ। दोपहर 2 बजे वहाँ से निकला और नूरपुर के रास्ते रात 8 बजे पालमपुर पहुँचा। रास्ता पर्वतों का था तो मज़ेदार रहा।

पालमपुर में BSNL इंस्पेक्शन क्वार्टर बुक करवा रखा था 3 दिन की ख़ातिर। तो रात खाना खा कर पड़ गया।
नींद गजब की आई।
अगले दिन जागा 8 बजे। चाय नाश्ता करके पालमपुर से निकला मैक्लोडगंज के लिए। निकलते ही बारिश हो गई।

एक ढाबे पर रुक कर कढ़ी चावल लपेटे। फिर चल पड़ा। बारिश रुक चुकी थी।
पालमपुर से मैक्लोडगंज के रास्ते में चाय के बागान हैं। मन मोहते हैं। कई कई जगह ऐसी मस्त ढलान वाली सड़क है की मैंने बाइक का इंजन ऑफ़ कर दिया कई बार।
बिना इंजन के आवाज़ के पहाड़ों की सांय सांय वाली आवाज़ बहुत सुखद जान पड़ी।

मैक्लोडगंज पहुँचा दोपहर में। वहाँ घूमा फिर और शाम फिर लौट पड़ा पालमपुर BSNL क्वार्टर के लिए। रास्ते में बारिश हो गयी। भीग गया पर बीमार नहीं हुआ।

रात पहुँचा पालमपुर और खाना खाकर सो गया

अगले दिन सुबह 8 बजे पालमपुर से निकला दिल्ली के लिए

वापसी ऊना के रास्ते हुई। रात पानीपत के बाद एक ढाबे पर खाना खा कर चारपाई पर सो गया। प्यारे से छोटू को बोल का की भाई सुबह 4 बजे जगा दियो।
उसने वैसे 4 बजे जगा दिया। चाय पीकर निकल पड़ा।
7 बजे दिल्ली लग गया।


अब बात अपनी बेवकूफ़ी की। बाइक से सम्बंधित कोई सामान नहीं लेकर चला। जैसे wires extra tube हवा भरने का पंप वगेरह। न छाता न बरसाती की बारिश से बच सकूँ।
:o:o:o
वो तो ईश्वर की कृपा रही जो यात्रा मंगलमय रही