Thursday, 10 December 2015

खजुराहो यात्रा, भाग: 2


पांडव प्रपात से हमने प्रकृति का शुद्ध जल अपनी बोतल में भरा और वापस जाने के लिए सीढ़ियों को देखा लगा कि यार जितना आनंद और सुकून यहाँ रहा अब सीढ़ियां चढ़ने में पता चलेगा।

खैर जितना हमें लग रहा था उतना मुश्किल नहीं रहा उन सीढ़ियों पर ऊपर जाना।
शायद उस स्थान पर बिताये हुए अच्छे और स्फूर्तिदायक पलों की वजह से शरीर और मन दोनों ही तरोताज़ा हो गए थे।

हम लोग ऊपर पहुँचे। ऊपर चंद्रशेखर आजाद जी की मूर्ती स्थापित है। और पांडव प्रपात का ऐतिहासिक महत्व लिखा हुआ है, भारत की आज़ादी की लड़ाई के सन्दर्भ में इतिहास में 4 सितम्बर 1929 को इस स्थान पर क्रांतिकारियों की बैठक हुई थी। जिसके अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद जी थे।
सोच कर भी अजीब सा एहसास जागृत हो जाता है की क्रांतिकारियों का जज़्बा क्या रहा होगा जो ऐसे वीराने और भयंकर जंगल में बिना किसी खास सुविधाओं के बैठकें करते रहे होंगे। यदि आज से तुलना की जाय उस वक़्त की तो उस समय तो यह स्थान दुर्गम स्थानों की श्रेणी में ही रहा होगा।

जज़्बे को सलाम है।

खैर वापस हम लोग 600 मीटर की उस सड़क पर मस्ती करते हुए चल दिए। फ़ोटो खींचे गए सबकी मर्ज़ी के हिसाब से, कुल मिला कर बहुत ही अच्छी दोपहर और शाम बीती।

वापस आये तो ऑटो वाले भैया मुस्कुराते ही मिले। चेहरे पर कोई तनाव या झल्लाहट नहीं कि गधों कितना समय लगाया।
संतुष्टि बड़ी चीज़ है। चाहते और कहते सब हैं, मिलती किसी किसी को है। हालाँकि हासिल खुद ही करना है। दे कोई नहीं सकता।
खैर हम तीनों उनके ऑटो में बैठ गए और सवारी चल पड़ी वापस खजुराहो की तरफ।

रास्ते भाई अगले दिन और शाम का प्रोग्राम बनाते रहे। सारा जीवन हम प्रोग्राम ही बनाते रहते हैं, और उस प्रोग्राम से इतर कुछ भी घटित होना हमें पसंद नहीं।

सब बातों व घटनाओं पर हम खुद का नियंत्रण चाहते हैं।
यही संतुष्टि की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता है।

केन नदी के पुल पर खड़े होकर अस्त होते सूर्य को देखना बहुत गजब का एहसास था। कइयों के लिए यह एडवेंचर, कइयों के लिए बस रोज घटित होती घटना, कइयों के लिए फ़ोटो के लिए बेहतरीन क्षण, मेरे लिए क्या था मैं उसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता।
कुछ मेरे अंदर में उतरता सा मालूम पड़ता है। हमेशा जहाँ भी सूर्यास्त देखता हूँ।
केन नदी के पुल के ऊपर से वो दृश्य बहुत से एहसास दे गया।

वहाँ से आगे बढे, 4 या 5 kms के बाद जहाँ से मुख्य सड़क छोड़ कर हमें गाँव के बीच वाले रास्ते पर उतरना था, बस वहीँ कोने पर मुझे चाय की दुकान दिख गई। मैंने ऑटो रुकवा दिया। चाय की दुकान बस वैसी ही थी जैसे किसी पिछड़े गाँव देहात के चौराहे पर होती है...
चूल्हा मिट्टी का, काला पड़ चुका चाय बनाने वाला बर्तन, उसके बगल में चाय लिए और इंतज़ार में केतली, ऊपर कचरी पापे और रस की धूल से ढकी पिन्नियां,
एक कढ़ाई जिसका रंग ब्लैक होल से भी काला, उसमें जाने कौन सा तेल जल कर लालिमा लिए हुए, और बगल में समोसे पड़े हुए जो आकार से समोसी नाम की गरिमा बढ़ाते हुए।

खैर दुकान जैसी भी रही हो, मैंने वहाँ चाय पीने का मन बना लिया था, 4 चाय का आर्डर दिया, चाय बनने में ज्यादा समय नहीं लगा, हाथ में चाय आई तो उन समोसियों ने बड़ी आस के साथ देखा, मैंने भी कहा कि जैसी भी हो तुम, मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। और 2 उठा ली खाने को, रविंदर भी लालायित हुआ, उसने भी भोग लगाया, मैंने ऑटो ड्राईवर शैलेन्द्र से कहा की भैया आप भी लो, वो माने और उन्होंने भी समोसों का आनंद लिया, दुकान का रंग रूप जो भी रहा हो, समोसे स्वादिष्ट थे, या भूख के कारण लग रहे थे, इसका निर्णय अभी तक नहीं कर पाया।

वहाँ से चाय की च्यास मिटा कर हम सभी ऑटो पर सवार होकर खजुराहो के तरफ निकले।
खजुराहों पहुँचते पहुँचते शाम के 7 बज गए, अँधेरा हो गया था, सोचा की लाइट & साउंड शो देखेंगे, पर सोचा हुआ सदैव पूरा नहीं होता।

खजुराहो में प्रवेश करते ही फिर से च्यास लग गई, शैलेन्द्र ने बताया की यहाँ चाचा जान की मशहूर चाय मिलती है, हम सभी ने मशहूर शब्द को गंभीरता से लिया और चाचा जान को भी।
ऑटो सीधा चाचा की चाय की दुकान के सामने रुका, जो की खजुराहो में प्रवेश करते ही है, पूर्वी परिसर से 2 km पहले सड़क के किनारे ही।

दुकान जो कि दुकान कम और खोखा ज्यादा थी, अँधेरे से सराबोर, भंगेडियों का अड्डा सी जान पड़ी, मशहूर शब्द से कसम से विश्वास ही उठ गया, पर जब रुके ही हैं तो चाय तो पीनी बनती थी, यात्रा का यही आनंद है, कुछ निश्चित नहीं।

60 से 70 साल के चाचा थे, चचा जान थे, ईश्वर उन्हें दादा परदादा बनाये, वो चाय बनाने में ऐसे तल्लीन दिखे जैसे कोई माँ अपने नवजात शिशु की तेल मालिश कर रही हो, किसी के आने से बेख़बर, किसी साधू की तरह समाधी में मस्त, हमने चाय के लिए बोल कर समाधी में व्यवधान डाला, चचा बड़े निश्चिन्त भाव से बोले कुछ नहीं, बस सर हिला कर, नज़रों से इशारा किया की हुज़ूर दिल्ली वालों तशरीफ़ रखो।हम सभी बैठने के लिए स्थान तलाशते उस से पहले वहाँ उपस्थित उनके रोज के बूढ़े ग्राहकों ने अपनेपन का परिचय देते हुए कुर्सियां खाली करके हमें बैठने का आग्रह किया, अजीब लगा, किन्तु उनका आग्रह टाला नहीं, बैठ गए, मद्धिम से प्रकाश में कीट पतंगे हमसे अटखेलियां सी करने लगे, हमने भी उन्हें शोहदों सा सम्मान दिया, मने नज़रअंदाज़ किया, जैसे आने जाने वाली नवयुवतियां गली के लुच्चों के साथ करती हैं, तकरीबन 15 मिनट के बाद मशहूर चाय बनी, लगा जैसे चचा की समाधी पूरी हुई, तेल मालिश ख़त्म।

यहाँ एक बात कहना चाहूँगा, चाय पीकर ज़रा भी अफ़सोस न हुआ वहाँ रुकने का, और इंतज़ार करने का।

चाय वाक़ई में गजब स्वाद लिए हुए थी, सच में लाज़वाब।
वैसी चाय और बनाने वाला दोनों ही संसाधनों की कमी के होते भी मशहूर हुए बिना नहीं रह सकते हैं।

चाय का स्वाद लिया, धन्यवाद पैसों के संग दिया और खजुराहो बाज़ार की तरफ हो लिए

बाज़ार पहुँचें तो सभी ने अगले दिन पन्ना टाइगर रिज़र्व जाने का प्लान बनाया, मैं थोड़ा सा संशय में था जाने के क्योंकि मुझे पता था की अभी 16 तारीख को ही रिज़र्व आम जनता के लिए खुला है, और अभी टाइगर दिखने की सम्भावना न के बराबर थी, क्योंकि सर्दियाँ अभी कायदे से प्रारम्भ नहीं हुई थी ऐसे में टाइगर के दिखने की सम्भावना कम थी, मुझे लगा की मित्रों को टाइगर नहीं दिखा तो कहीं मायूसी यात्रा का मज़ा न किरकिरा कर दे, फिर भी जो जैसा की तर्ज़ पर होने दिया और सफारी के लिए जीप बुक कर दी, 2000 हज़ार में बात तय हुई, यही रेट हैं मारुती जिप्सी के खजुराहो से पन्ना टाइगर रिज़र्व घुमा के लाने के। जीप मिलने में दिक्कत न हो इसके लिए ऑटो ड्राईवर शैलेन्द्र ने हमारी मदद की। और अगली शाम रिज़र्व से वापसी पर मिलने का वादा करके वो चले गए, हम तीनों मित्र बाज़ार में घुमते रहे, कुछ तलाशते रहे जो की नहीं मिला।

हॉटेल के कमरे में आये, थके थे, और थकान मिटाने का साज़ों सामान वीर बहादुर भाई साथ लेकर आये थे, तो महफ़िल सज गई, बकलोली होती रही, पर विकटें नहीं गिरी, हाँ पारी लंबी चली, इतनी लंबी की खाने का जब होश आया तो पता चला की अब शायद खाना न मिले कहीं।

होटल जिसमें ठहरे थे वहाँ कुछ था नहीं खाने को तो बाज़ार व रुख किया, वहाँ जगह जगह रामलीला का मंचन चल रहा था, उम्मीद जगी की भोजन मिल जाएगा, एक रेस्टोरेंट पर गए, वो लोग सामान समेट कर खुद ही खाने में लगे थे, पर अथिति देवो भवः

उन्होंने हमें बैठने को कहा और यथासंभव भोजन बना कर लाये, हमने किया की नहीं याद नहीं, पर पैसे पूरे चुकाए और चल दिये कमरे की तरफ़।

सुबह जल्दी जागना था

खैर सुबह जल्दी जाग गए सभी बंधू, नहा धो कर तैयार हुए, पानी की बोतलें भरी, और होटल के नीचे उतरे, जीप वाले भैया ठीक 5 बजे प्रातः आ गए। और हम सभी टाइगर रिज़र्व की तरफ़ चल दिए, अँधेरे में सड़क पर केवल जीप की रौशनी का सहारा था, सड़क बहुत अकेली सी थी, सब साथ के लिए, सबके लिए फिर भी तन्हा

ठीक 6 बजे हम रिज़र्व पहुँचे और गाइड किया, रिज़र्व के प्रवेश के लिए और गाइड जो की अनिवार्य है दोनों का शुल्क चुकाया, 1600 रुपयों के आस पास था। और हर हर महादेव का उदघोष करते हुए टाइगर रिज़र्व में बाघ दिखने की आशा में प्रवेश किया

पन्ना टाइगर रिज़र्व में विभिन्न प्रकार की किस्में हैं पेड़ों की, किन्तु तेंदू पत्ते वाले पेड़ बहुतायत में हैं।

बस अब इन्हीं पेड़ पौधों का सहारा था मुझे तो, बाकी दोनों मित्रो को बाघ दिखने की आशा थी

मुझे उस जंगल का नितांत वातावरण मोहित किये हुए था, उसकी ख़ामोशी को मैं अपने अंदर गहरे में उतार लेना चाहता था, पर असफल रहा हमेशा की तरह। पर जितना भी महसूस किया, वो गजब था।

यहाँ से वहाँ घुमते रहे, बहुत से जानवर दिखे, हिरन भालू चीतल, सियार, जंगली कुत्ते, पर वो जालिम नहीं दिखा जिसकी चाहत थी, चाहते अक़्सर अधूरी रह जाती हैं, इसी अधूरेपन में ज़िन्दगी पूरी करनी पड़ती है, यात्रा का आनंद इसी अधूरेपन में है यदि कोई ले सके, समझ सके

कमबख्त टाइगर नहीं दिखा, एक दिन पहले दिखा था अपने परिवार के साथ, रिहाइशी इलाके की तरफ वाली सड़क के बीचों बीच महफ़िल जमाई थी, बड़ी देर के बाद जंगल की तरफ गया, ऐसी सूचना हमें गाइड ने दी, और जहाँ जहाँ कॉल होती रही टाइगर की वहाँ वहाँ जिप्सी को ले जाते रहे गाइड और ड्राईवर, कॉल का मतलब जंगल में बाकी छोटे मोटे जानवरों की उन आवाज़ों से है जो वो टाइगर को देखने पर निकालते हैं, गाइड पहचान जाता है अपने अनुभव से, थोड़ी देर बाद हम भी अनुभवी होने लगे थे, पर अनुभव जो समय के साथ आये वही काम आता है।

टाइगर नहीं दिखा

और हम दोपहर 12 बजे तक जंगल से बाहर आ गए, सीधे खजुराहो गए, जिप्सी वाले ने बाज़ार में ड्राप किया, हमने ऑटो वाले को फ़ोन किया, पर क़ो एअरपोर्ट गया हुआ था, उसने किसी दुसरे ऑटो वाले को भेजा, उस से बात तय हुई की हमें पश्चिमी भाग वाले और दक्षिणी भाग वाले मंदिरो को दिखायेगा, फिर स्टेशन ड्राप करेगा।

बात तय हो गई, हमने मंदिर देखे, शाम को स्टेशन पहुँचें और प्लेटफार्म के अंतिम छोर पर जहाँ कुछ कुत्तों के अलावा हम कुत्ते थे, महफ़िल जमाई, समझ गए न???
ट्रेन चलने में जो समय बचा था उसका सदुपयोग बचे हुए साज़ो सामान को ख़त्म करने में लगाया।

बस क्या बताऊँ की कितना आनंद आया....


यात्रा हमेशा बहुत से अनुभव देकर जाती है, हम भी अपने अपने अनुभवों के साथ ट्रेन पर सवार हुए, और बतियाते बतियाते कब खाये पिए और कब सो गए पता ही नहीं चला।
और सुबह सुबह दिल्ली आ गए...


इस वादे के साथ की यात्राएं चलती रहेंगी सभी को नमन

Tuesday, 27 October 2015

खजुराहो यात्रा भाग: 1

16 अक्टूबर 2015 को रात 8:10 की ट्रेन थी। हम तीनों मतलब रविंदर, वीर बहादुर और मेरे में तय ये हुआ की सीधा स्टेशन पर मुलाकात होगी।
मेरी और रविंदर की मुलाकात केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन के अंदर मुलाकात तय हुई क्योंकि हम दोनों मेट्रो का सफ़र करके निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुँचते। और वीर बहादुर सीधा ऑफिस से ऑटो लेकर आता।

रविंदर को 7 से 7:15 के बीच का समय दिया मेट्रो स्टेशन मिलने का। और वो 7:15 पर ही आया। मैं 15 मिनट पहले पहुँच गया था। और प्रतीक्षा करना मेरे लिए आसान सा काम है। बड़े फुरसत वाले इंसान है न।

रविंदर मिला फिर हमने बदरपुर वाली मेट्रो ली। जवाहर लाल नेहरू मेट्रो स्टेशन उतरे। वहाँ बाहर निकलते ही ऑटो मिला। उस से निज़ामुद्दीन चलने को कहा तो बोला 60 रूपए लगेंगे। रविंदर बैठ गया था अंदर। मैं बोला भाई मीटर से चल लो। वो बोला ख़राब है (दिल्ली में ऑटो मीटर) मंगल पर वातावरण के जैसे हमेशा ख़राब ही रहता है।
मैंने थोड़ा गुस्से में बोला कि अब जाना नहीं इसमें और ट्रैफिक कंट्रोल रूम में शिकायत करनी है। कि 3 kms से भी कम दूरी के 60 रूपए मांग रहा है। मैंने बता दिया ऑटो वाले को की मैं बहुत फुरसत में हूँ आज।
वो थोड़ा रिरियाया और बोला चलो साहब शिकायत के चक्कर में काहे पड़ना। बोला क्या दोगे। मैंने कहा 30 में जाता हूँ। बोला 40 दे देना। मैंने कहा चल।
खैर 10 मिनट में निज़ामुद्दीन स्टेशन पर पहुँच गए। मैंने उसको 50 रूपए दे दिए। और 10 रूपए वापस नहीं लिए। पता नहीं क्यों गुस्सा उतर गया था। और 10 रूपए फालतू देना बुरा भी नहीं लगा।
शायद कहीं घूमने जाने की ख़ुशी ज्यादा थी।

खैर वीर बहादुर भी स्टेशन पर मिला।
ट्रेन अपने समय पर चल दी। ठीक 8:10 पर

रविंदर घर से आलू की सब्जी अचार और पूड़ियाँ बनवा कर लाया था। दबा कर खाया। स्वादिष्ट भोजन और ऊपर से घूमने जाने की ख़ुशी। मज़ा दुगना हो गया।

मथुरा तक यूँ ही खाते पीते और मस्ती करते रहे।


उसके बाद नींद ने कब अपनी बाहों में समेट लिया पता ही नहीं चला। मेरी आँख सुबह 6 बजे खुली।

मैंने दोनों की सोते हुए फ़ोटो ली। और 6:30 पर जागे की फ्रेश हो लें वो।
7 बजे ट्रेन खजुराहो पहुँची। खजुराहो स्टेशन छोटा सा है। पर साफ़ सफाई और सुंदरता के मामले में दिल्ली से बहुत बड़ा

खजुराहो रेलवे स्टेशन से खजुराहो जहाँ western group of temples हैं की दूरी 8 kms है।
पहले मैंने यह सोचा था की यहीं स्टेशन पर फ्रेश होकर सीधा घूमने चला जाए। पर मेरे दोनों साथी बोले की रूम ले लिया जाय कहीं। मैंने कहा सोच लो थोड़ी देर। तब तक मैं कुछ फ़ोटो ले लेता हूँ।






खैर फोटोग्राफी के बाद भी फैसला कमरा लेने का हुआ। स्टेशन से बाहर निकले भी न थे की एक ऑटो वाले भाई साहब मिल गए। पूछने लगे की चलना है। मैं थोड़ा संकोच में था की टूरिस्ट्स वाला इलाका है जाने क्या पैसे माँग ले। अभी उस से बात हो ही रही थी की एक होटल वाला भी आ गया। हमें लगा को एजेंट होगा होटल का।
खैर ऑटो वाले भाई जिनका नाम शैलेन्द्र था ने 3 जनों के 60 रूपए मांगे 8 kms की दूरी के। कमाल है यार..इतना सस्ता तो दिल्ली में भी नहीं। ऑटो में हम तीन जनों के अलावा वो होटल वाला भी बैठ गया।
पूरे रास्ते बोलता रहा की होटल देख लो। न पसंद आये तो कोई बात नहीं।
खैर साहब होटल के बाहर ऑटो रुका। मैंने शैलेन्द्र ऑटो ड्राईवर को 60 रूपए दिए। उसने ख़ुशी ख़ुशी ले लिए। उसका मोबाइल नंबर भी ले लिया मैंने की कहीं जाना पड़े तो इन्हीं भाई को बुला लेंगे

कमरा देखा, अच्छा खासा बड़ा था। बिस्तर और टॉयलेट भी साफ़ सुथरे थे। 600 रूपए में बात तय हुई।
हमने सामान पटका और अपने अपने कोने पकड़ लिए। धीरे धीरे नहाने धोने का कार्यक्रम बना। नहाधोकर लगा की कमरा ठीक ही लिया।
9:30 के करीब बाहर निकले खजुराहो के पश्चिमी भाग वाले मंदिर होटल से 2 मिनट की पैदल दूरी पर थे। हम वहाँ पहुँचे।
10 रूपए प्रति जन के हिसाब से टिकट्स लीं।


प्रवेश किया। और बाईं तरफ से मंदिर देखने शुरू किये। अभी पहला मंदिर ही देखा जो की वराह अवतार का था, कि हमें समझ आ गया की यार गाइड होना चाहिए कोई जो इनके बारे में बताता रहे।

हमें पता चला की स्वचालित ऑडियो उपकरण मिल जाता है यहाँ। यदि आप गाइड न करना चाहें। उस ऑडियो उपकरण की भाषा जो आप चुनना चाहें वो रख लें और जिस स्थान पर जाएँ वहाँ की संख्या पर उपकरण के पटल जो की स्पर्श यानी टच स्क्रीन सुविधा वाला था बस टच करते ही उस स्थान के बारे में बताना शुरू कर देता था, pause repeat forward भी और कीमत मात्र 70 रूपए।

हमनें तीन लेने की सोची पर दो ही मिले क्योंकि तीसरे का हेडफ़ोन ख़राब था।
वैसे अच्छा हुआ 2 ही मिले।

खैर पश्चिमी भाग वाले मंदिर बहुत सुन्दर हैं। और भव्यता देखते ही बनती है। यदि आपको भी कोई ज्ञान न हो शिल्पकला का जैसे मुझे नहीं तब भी आप घंटों उन मंदिरों पर की गयी नक्काशी और मूर्ती कला को निहार सकते हैं।






कौन सा मंदिर कब बना और किसने बनवाया इसकी जानकारी यहाँ नहीं लिख रहा। वो जानकारी आपको कहीं भी मिल सकती है।
और मुझे इतना याद भी नहीं रखा जाता।
हर मंदिर की एक खास बात जो मैंने गौर किया वो यह है कि किसी भी मंदिर के मुख्य रूप से जो भी मूर्ती स्थापित है उसपर प्राकृतिक प्रकाश पड़ता रहता है। मने आप प्रवेश करेंगे तो पाएंगे की पूरे मंदिर में अँधेरा जैसा भी होगा तब भी गर्भगृह में स्थापित मूर्ती पर पूरा उजाला है जैसे कोई ख़ास उपकरण की सहायता से रौशनी बिखेरी गई है।




यह कोई चमत्कार नहीं, निमार्ण का उत्कृष्ट नमूना जानिये। बहुत उच्च स्तर के कारीगरी है।

हम सभी 11 बजे के करीब बाहर निकले।
सुबह नाश्ता नहीं किया था। जो की कर लेना चाहिए था।
खैर बाहर आकर परांठे खाये। थोड़ा बाज़ार में घूमे फिर सभी ने मन बनाया की पांडव गुफ़ा प्रपात घूम के आया जाए।

ऑटो ड्राईवर शैलेन्द्र को फ़ोन किया। उसने वाटर फॉल तक घुमा के लाने के लिए 600 रूपए बताये। मैंने कहा की दोस्तों से विचार करके बताता हूँ।

एक दो ऑटो वालों से पूछा पर 800 से कम किसी ने नहीं बताया।

वापस शैलेन्द्र को फ़ोन किया की भैया ऑटो लेकर आ जाओ।
वो बोला आता हूँ।

उसको खजुराहो संग्रहालय के सामने बुला लिया। और जब तक वो आये उस समय को हमने म्युज़ियम देखने में लगाया। हमने टिकट पता करनी चाही तो पता चला कि जो टिकट मंदिरों को देखने के लिए खरीदी थी 10 रूपए हर बन्दे के हिसाब से वही यहाँ भी काम करेगी।

शुक्र है रविंदर ने वो फेंकी नहीं थी।
खैर म्युज़ियम ज्यादा बड़ा नहीं था। 10 मिनट में देख डाला।
बाहर आये और शैलेन्द्र ऑटो लेकर इंतज़ार में था।

हम तीनों ऑटो में बैठ गए और पांडव गुफ़ा प्रपात का सफ़र शुरू हुआ।
हम सभी कहीं न कहीं सोच रहे थे की 600 रूपए बहुत ज्यादा हैं ऑटो के लिये। कम में बात बनती तो ठीक रहता।
खैर सफ़र लंबा था, मुख्य सड़क को नहीं चुना जो की हाईवे था जो पन्ना को जाता है, और निर्माण कार्य जोरों शोरों से चालू था पिछले कई सालों से जो आगे भी कई वर्षों तक जारी रहने का अनुमान है।
जोरों शोरों को समझिये
उस सड़क पर प्रत्येक वाहन को चलने के लिए जोर लगाना पड़ता था जरुरत से ज्यादा और वाहन कैसा भी हो सड़क पर शोर होना लाज़मी हो जाता है।

बड़े बड़े रोड़े डाले हुए हैं उस सड़क पर जिस से चलना या चलाना दोनों ही मुश्किल था।

पर ऑटो वाले भैया ने कहीं बीच का रास्ता जो की गाँवों के मध्य से होकर निकालता है को चुना
वीर, मैं, शैलेन्द्र ऑटो वाले और रविंदर (बाएं से दायें)

वैसे तो 35 या 40 kms का सफ़र है पर गाँव के बीच बीच से निकलते हुए सफ़र थोड़ा लंबा हो गया।

राजेन्द्र नगर के रास्ते से निकले हम। पांडव फॉल भोजपुर में पड़ता है, वहाँ तक पहुँचने के लिए हमें मुख्य सड़क तक आना पड़ा, जो की पन्ना टाइगर रिज़र्व के सामने से निकलती है।
उस सड़क पर आने के बाद ही उसके निर्माण के जोरशोर का पता चला और पता चला की ऑटो वाले भैया ने 600 रूपए कम ही मांगे।
सड़क खस्ताहाल, उस से बचने के लिए भाई ने गाँवों के बीच से निकाला ऑटो।

मात्र 4 kms का सफ़र ही किया था हमने उस जोरशोर वाली सड़क पर और शरीर का बाजा बज गया

हमें 2 घंटे से ज्यादा लगे पांडव प्रपात पहुँचने में।
वहाँ पहुँच कर टिकट ली। रिज़र्व का क्षेत्र होने के नाते उसके रखरखाव के लिए शुल्क लगाया गया है उस क्षेत्र में घूमने के लिए।

खैर साहब हम चल पड़े पैदल 600 मीटर के रास्ते पर। ऑटो बाहर ही खड़ा रहा। क्योंकि तिपहिया के 220 रूपए और देने पड़ते।
इसलिए हमने निर्णय किया की पैदल चला जाय जिससे पैसे बचें। दूरी भी 600 मीटर थी बस।
प्रपात और पांडव गुफा तक पहुँचने के लिए 294 के करीब सीढियां हैं। प्रपात की गहराई देख हम थोड़ा संकोच में पड़े की उतर जाएंगे पर वापसी में थक न जाएँ ज्यादा। 40 kms से ज्यादा का सफ़र ऑटो में करने के बाद हिम्मत थोड़ा सोचने पर मजबूर हो जाती है।

हम प्रपात में उतरे, वहाँ पहुँचने के बाद मैं बता नहीं सकता की कितनी असीम शाँति का अनुभव हुआ।
शब्द नहीं वहाँ की सुंदरता के बखान का। प्रपात से ज्यादा पानी तो नहीं निकल रहा था पर भव्यता देख अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जब पानी अपने पूरे वेग में आता होगा तो कैसा नज़ारा होता होगा।
एक सरोवर ठीक प्रपात के नीचे है, काफी बड़ा। उसका शांत ठहरा पानी ठहरने को मजबूर करता है। सरोवर के दाहिने तरफ पहाड़ी से पानी झरता रहता है, उनमें कई धार का रूप में भी गिरता है। उस धार में आप बोतल अड़ा दो तो 2 मिनट में भर जाए शुद्ध निर्मल मिनरल का पानी। उसका स्वाद अवर्णीय है।





50 मीटर के करीब का हिस्सा ऐसा है के नीचे खड़े हो जाने पर सारा भीग जाएँ। ठंडा पानी भावों की गर्मी उत्पन्न करने को काफी है। बस उसके नीचे से होकर गुजरने भर से शरीर और मन ताज़ा हो गए। हम तीनों दोस्त वहीँ बने एक चबूतरे पर आसमान के तरफ आँखें करके लेट गए।
ऊपर से बरगद या जाने कौन सी पेड़ की जटाएं लटकी हुई थीं जिनसे पानी टपकता रहता है।
थोड़ा उस पानी से बच कर लेटे।
ज्यादा देर आँखें खुली न रख पाये।






वहाँ का मनोहर वातावरण और पानी के झरने की मनभावन आवाज़ ने आँखें बंद कर दीं।
उसी अवस्था में बहुत देर तक लेटे रहे।
मन ही नहीं था की आँखें खोलें। मन थोड़ी देर के लिए विचारों से भागने लगा।
लगा जैसे नींद आ जायेगी

यात्रा से पहले की मंत्रणा....यानी मीटिंग



अक्टूबर का महीना प्रारम्भ होने से पहले ही घूमने वाले कीड़े (sleeper cells) जो मेरे अंदर हमेशा जागृत अवस्था में रहतें है बहुत तेजी से कुलबुलाने लगे थे, और अक्टूबर प्रारम्भ होते ही उन्होंने भयंकर अराजकता फैला दी, शरीर की लोकतान्त्रिक व्यवस्था लगभग चरमरा सी गई, मैंने तुरंत प्रभाव में आकर 4 अक्टूबर 2015 रविवार का दिन मुक़र्रर किया इस विषय अपने दिमाग से मंत्रणा हेतु।

खैर साहब 4 अक्टूबर 2015 को सुबह से ही पूरे शरीर में हलचल थी। जो सुबह के ढेर सारे नाश्ते के बाद भी शांत नहीं हुई।
नाश्ता डकार लेने के पश्चात् दिमाग को बुलाया और लंबे सोफे पर तकिया लगा कर लंबा हो गया।
और वैसे ही लंबवत रहते हुए दिमाग से मंत्रणा का आरम्भ हुआ।

मंत्रणा सुचारू रूप से चले इसीलिए हम दोनों बुद्धुओं मने मैं आउट दिमाग ने स्मार्टफ़ोन को भी बुला लिया।
स्मार्टफ़ोन के आने के बाद लगा की जैसे अब तक की मंत्रणा का कोई औचित्य नहीं था इसके बिना। खैर देर आये दुरुस्त आये वाला भाव लेकर मंत्रणा को आगे बढ़ाया।

घूमने को लेकर कई स्थान चर्चा में सम्मिलित किये गए।
त्रिवेंद्रम सबसे पहला रहा। स्मार्टफ़ोन ने बीच में टांग अड़ाते हुए बताया की वहाँ के लिए रेलवे विभाग की तरफ से आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई फौरी सहायता नहीं मिल पाएगी। और शारीरिक अराजकता जस की तस रहेगी।

दूसरी जगह कर्नाटक में हम्पी थी। इसपर फिर से स्मार्टफ़ोन ने अपनी बुद्धि को बड़ा साबित करते हुए 3 दिन जाने और 3 दिन आने में लगने वाले समय का रोना रोया और रेलवे विभाग वाले उपरोक्त असहयोग वाला कंटक हमारे पैरों में घुसा मारा।

अब तक दिमाग और मेरी दही बिलो चुका था स्मार्टफ़ोन।

वैसे बात उसकी भी सही थी। दोनों स्थान अच्छी खासी दूरी पर हैं और व्यवस्था में राजकीय घाटे के मद्देनज़र हवाई यात्रा की गुंजाईश अच्छे दिन जैसी थी। जो पता तो थी की होती है पर हो नहीं सकती थी।

दिमाग ने अचानक दिल की सहायता (जो की गुप्तरूप से मंत्रणा में शामिल था) से खजुराहो का नाम सुझाया।
स्मार्टफ़ोन ने मौका लपकते हुए खजुराहो आवन जावन की सभी जानकारियों को मेरे समक्ष रख दिया। ठीक किसी चापलूस अधिकारी की तरह।
और अंतः खजुराहो ही उचित स्थान जान पड़ा।

रेलवे आरक्षण उपलब्ध था। वो करने से पहले दिल ने यात्रा में एक साथी की दरकार की, जो कि बहुत कम करता है। और नाम सुझाया रविंदर प्रताप सिंह।

भांजा कम मित्र ज्यादा। उसको फ़ोन मिला कर उसकी सहमति जानी। और उसकी हामी के बाद रेलवे आरक्षण कर दिया गया।
आरक्षण के बाद दिल ने गरियाते हुए एक नाम और सुझाया वीर बहादुर सिंह।

दिमाग ने अपनी चाल चलते हुए कहा कि आरक्षण हो गया है। किन्तु दिल मजबूती से नाम दोहराता रहा।
और अंत में वीर बहादुर सिंह को स्मार्टफ़ोन ने संपर्क साध कर उनकी रजामंदी ले ली।

खजुराहो दिल्ली से दूरी के हिसाब से एक ऐसा स्थान है जिसे एक रात्रि रेल यात्रा में कवर किया जा सकता है।
जिस से कम यात्रा करने वाले मित्रों को भी बोरियत से बचाया जा सकता है।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर 16 अक्टूबर 2015 का आरक्षण किया गया।

उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (22448/ 22447) जो की प्रतिदिन दिल्ली से मानिकपुर और खजुराहो  के बीच चलती है। यह एक स्लिप ट्रेन है। जिसका मतलब यात्रा के दौरान समझ आया।

ये मानिकपुर जाती है किन्तु आधे डिब्बे महोबा स्टेशन से अलग हो जाते हैं। और आधी रेल वहाँ से खजुराहो मध्यप्रदेश की तरफ और आधी मानिकपुर की तरफ चली जाती है।
महोबा स्टेशन ही इनके बंटवारे का स्थान है।

तो सभी बातें तय हो गयी। साथ जाने वाले मित्र और 16 अक्टूबर 2015 को जाना और 18 अक्टूबर 2015 को वापसी।

Thursday, 8 October 2015

अवलोकन: काहे की जल्दी है?

अवलोकन

स्थान: कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन
दिनांक: 8 अक्टूबर 2015
समय: शाम 6:30 के आसपास
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दिल्ली शहर भी बहुत तेजी के साथ चलने की आदत डाल रहा है, कुछ लोग कह सकते हैं की बहुत फ़ास्ट है जी...
मेट्रो स्टेशन हो या सड़क हर तरफ अफ़रातफ़री सा माहौल देखने को मिल जाएगा।

कहीं कोई किसी के रास्ते में आने पर मुँह बना रहा है, कहीं किसी के कंधे टकराने से चलने में बाधा आ जाती है, कहीं किसी की टक्कर से किसी के हाथ से मोबाइल गिरते गिरते बचा, शुक्र है ज़िन्दगी बची वाला भाव चेहरे पर दिखता है, कहीं कोई मेरी धीमी गति की वजह से मुझे धकियाते हुए बुदबुदाता हुआ कि फुरसत में है बावला 😄

हर 2 मिनट में नहीं तो 5 या 7 मिनट में अगली मेट्रो आ जाती है सामान्यतः,  पर सभी अजीब सी दौड़ का हिस्सा बने हुए से हैं।
यदि सुबह का समय हो तो समझ में आ सकता है कि हर किसी को अपने कार्यस्थल पहुँचने की जल्दी है पर शाम को भी यह आलम....उफ़्फ़ तौबा है

घर ही तो जाना है, कौन सी हाज़िरी लगानी है? पर नहीं कान में मोबाइल फ़ोन का लीड लगाए सभी डॉ से बदहवास फिरते हैं। अरे थोड़ा ठहर के चल लो भाई,  शायद जीवन अच्छा सा सा लगने लगे, विराम दो, जल्दी काहे की?

घर भी जाकर तुम्हें बुद्धू बक्से (टेलीविज़न) के आगे बुद्धू ही बनना है।
पता नहीं शायद मैं ही जीवन में बहुत धीमा हूँ। खैर...

पागल मन की बातें 

Monday, 5 October 2015

अफ़सोस:
4 अक्टूबर 2015, शाम का वक़्त
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आर के पुरम अपने घर जाने के लिए दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन से मेट्रो ली, हमेशा की तरह अंतिम कोच के अंतिम से पहले वाले दरवाज़े से प्रवेश करके बाईं तरफ की दो सीटें जो वृद्ध और विक्लांगों के लिए आरक्षित होती हैं उनसे एक सीट हट कर मैं बैठ गया।
बैठने पर एक विचार हमेशा की तरह मेरे स्वार्थी मन में आया की कोई मुझसे ज्यादा जरूरतमंद (सीट के लिए) मेरी नज़रों के सामने न आये। वरना एक बड़े परिवार के सबसे छोटे सदस्य और प्यारी सी बिटिया के बाप का बावला मन उसको सीट दे देगा। पर नियति ने अपना खेल खेला। मेरी दाहिनी तरफ जो आरक्षित सीटें थी उसमें से एक पर एक 14 या 15 साल की लड़की अपने 1 साल के भाई को गोद में लेकर बैठी थी और वो दुनिया की चालबाजियों से बेखबर सो रहा था। उसकी माँ शायद विकलांग और वृद्ध श्रेणी के आरक्षण के चलते नहीं बैठी थी। बस अपनी बिटिया को बिठा दिया कि छोटा बालक उसकी गोद में चैन से सो पायेगा। महिला की उम्र 35 के आसपास रही होगी।
खैर तभी एक 50 के अंदर उम्र वाली महिला शाहदरा स्टेशन पर मेरे ठीक सामने आकर खड़ी हो गई। एक बची आरक्षित सीट भी घिर चुकी थी।
वो महिला ऐसे मुँह बना रही थी जैसे 65 साल की आयू वाले व्यक्ति को खड़े होने में दिक्कत होती है। मन बावला पसीजा और मैं खड़ा हो गया की आंटी जी बैठ जाओ।
बैठते ही उसने अपने उन सभी संसाधनों को ठीक किया जिनसे उसकी उम्र का हिसाब लोगों को धोका दे सके।

फिर उसकी विस्तारवादी नीति का खुलासा हुआ। उसने आवाज़ लगाईं अपनी बिटिया को जो की नवविवाहिता जान पड़ी। मेरे बगल में जो सज्जन थे वो भी उसकी बिटिया के लिए खड़े हो गए।
अब एक महिला और जो उन्हीं के साथ थी उम्र 40 के नीचे वो भी अवतरित हुई। जिस 50 के लपेटे वाली महिला को मैंने सीट दी थी उसने मेरी दाहिनी तरफ बैठी उस 14 या 15 साल की बच्ची जो अपने 1 साल वाले भाई को गोद में सुलाये संभाले बैठी थी को धकियाना शुरू किया और एडजस्ट करने को कहा उस 40 साल वाली महिला के लिए।
सोते हुए बच्चे की माँ ने जो खड़ी ये सब देख रही थी ने विनम्रता से कहा की बच्चा सो रहा है ज़रा ध्यान से।
उस 50 साल के लपेटे वाली महिला ने अपना भद्दा मुँह खोला और बोली "क्या हुआ जो बच्चा है थोड़ा दब ले"
मैं बता नहीं सकता की कितना अफ़सोस हुआ। मन में आया की कहूँ कि आंटी एक छोटे बच्चे के लिए इतनी संवेदनहीनता, और ऐसे शब्द का प्रयोग करके आपने मुझे अफ़सोस करने पर मजबूर कर दिया की आप जैसे को सीट क्यों दी......
पर कुछ कह न सका दिल्ली का यह आम व्यक्ति वो भी पुरुष। शुक्र है ISBT आ गया तब तक, और इंटरचेंज के लिए मैं उतर गया वरना न जाने कब तक अफ़सोस और आत्मग्लानि होती.....


पागल मन की बातें

बेवकूफ़ी

एक बार मैंने भयानक बेवकूफी की। बाइक से निकल लिया घूमने।
सुबह 7 बजे दिल्ली यूनिवर्सिटी से निकला था सोच कर की जहाँ थक जाऊँगा रुक जाऊँगा। सारे दिन अपनी बजाज एवेंजर पर चलता रहा, पानीपत और अम्बाला रुका चाय पानी और लस्सी के लिए।

शाम को 7:30 के करीब पठानकोट पहुँचा, सोचा यहीं कहीं कमरा लेकर रुक जाऊं। खैर खाना खाया फिर मन किया की आगे पहाड़ों की तरफ चलूँ।
2 अक्टूबर का दिन था और रामलीलाओं के दिन थे। पठान कोट से चल दिया। थोड़ी थोड़ी दूर पर गाँव क़स्बे मिलते तो वहाँ की रौनक रामलीलाओं की मन को मोहती और बचपन की यादें ताज़ा हो जाती।

खैर रात 12 के करीब Dalhaousie पहुँचा। 200 रूपए में कमरा लिया। और कम्बल तान सो गया।

अगले दिन 9 बजे जागा। फ्रेश होकर चाय पी और निकल पड़ा। Dalhaousie में कोई खास रूची न थी तो चम्बा और खजिहार के रास्ते हो लिया।

चलता गया चलता गया तकरीबन 30 या 40 kms चला तो रास्ते में भलेई माता, भद्रकाली के मंदिर के बारे में पता चला।

ऊंची पहाड़ी के शिखर पर भव्य मंदिर है। माता सोने के गहनों से ढकी हुई थीं। कोई खास सुरक्षा नहीं। कहते हैं एक बार पुराने समय में किसी ने चोरी की कोशिश की थी। चोर अंधे हो गए और पकड़े गए।

बहुत शान्ति मिली वहाँ बैठ कर। भंडारे का आयोजन था क्योंकि नवरात्रे थे। दबा कर कढ़ी चावल खाये।

वहीँ से वापस हो लिया Dalhaousie की तरफ। दोपहर 2 बजे वहाँ से निकला और नूरपुर के रास्ते रात 8 बजे पालमपुर पहुँचा। रास्ता पर्वतों का था तो मज़ेदार रहा।

पालमपुर में BSNL इंस्पेक्शन क्वार्टर बुक करवा रखा था 3 दिन की ख़ातिर। तो रात खाना खा कर पड़ गया।
नींद गजब की आई।
अगले दिन जागा 8 बजे। चाय नाश्ता करके पालमपुर से निकला मैक्लोडगंज के लिए। निकलते ही बारिश हो गई।

एक ढाबे पर रुक कर कढ़ी चावल लपेटे। फिर चल पड़ा। बारिश रुक चुकी थी।
पालमपुर से मैक्लोडगंज के रास्ते में चाय के बागान हैं। मन मोहते हैं। कई कई जगह ऐसी मस्त ढलान वाली सड़क है की मैंने बाइक का इंजन ऑफ़ कर दिया कई बार।
बिना इंजन के आवाज़ के पहाड़ों की सांय सांय वाली आवाज़ बहुत सुखद जान पड़ी।

मैक्लोडगंज पहुँचा दोपहर में। वहाँ घूमा फिर और शाम फिर लौट पड़ा पालमपुर BSNL क्वार्टर के लिए। रास्ते में बारिश हो गयी। भीग गया पर बीमार नहीं हुआ।

रात पहुँचा पालमपुर और खाना खाकर सो गया

अगले दिन सुबह 8 बजे पालमपुर से निकला दिल्ली के लिए

वापसी ऊना के रास्ते हुई। रात पानीपत के बाद एक ढाबे पर खाना खा कर चारपाई पर सो गया। प्यारे से छोटू को बोल का की भाई सुबह 4 बजे जगा दियो।
उसने वैसे 4 बजे जगा दिया। चाय पीकर निकल पड़ा।
7 बजे दिल्ली लग गया।


अब बात अपनी बेवकूफ़ी की। बाइक से सम्बंधित कोई सामान नहीं लेकर चला। जैसे wires extra tube हवा भरने का पंप वगेरह। न छाता न बरसाती की बारिश से बच सकूँ।
:o:o:o
वो तो ईश्वर की कृपा रही जो यात्रा मंगलमय रही