अक्टूबर का महीना प्रारम्भ होने से पहले ही घूमने वाले कीड़े (sleeper cells) जो मेरे अंदर हमेशा जागृत अवस्था में रहतें है बहुत तेजी से कुलबुलाने लगे थे, और अक्टूबर प्रारम्भ होते ही उन्होंने भयंकर अराजकता फैला दी, शरीर की लोकतान्त्रिक व्यवस्था लगभग चरमरा सी गई, मैंने तुरंत प्रभाव में आकर 4 अक्टूबर 2015 रविवार का दिन मुक़र्रर किया इस विषय अपने दिमाग से मंत्रणा हेतु।
खैर साहब 4 अक्टूबर 2015 को सुबह से ही पूरे शरीर में हलचल थी। जो सुबह के ढेर सारे नाश्ते के बाद भी शांत नहीं हुई।
नाश्ता डकार लेने के पश्चात् दिमाग को बुलाया और लंबे सोफे पर तकिया लगा कर लंबा हो गया।
और वैसे ही लंबवत रहते हुए दिमाग से मंत्रणा का आरम्भ हुआ।
मंत्रणा सुचारू रूप से चले इसीलिए हम दोनों बुद्धुओं मने मैं आउट दिमाग ने स्मार्टफ़ोन को भी बुला लिया।
स्मार्टफ़ोन के आने के बाद लगा की जैसे अब तक की मंत्रणा का कोई औचित्य नहीं था इसके बिना। खैर देर आये दुरुस्त आये वाला भाव लेकर मंत्रणा को आगे बढ़ाया।
घूमने को लेकर कई स्थान चर्चा में सम्मिलित किये गए।
त्रिवेंद्रम सबसे पहला रहा। स्मार्टफ़ोन ने बीच में टांग अड़ाते हुए बताया की वहाँ के लिए रेलवे विभाग की तरफ से आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई फौरी सहायता नहीं मिल पाएगी। और शारीरिक अराजकता जस की तस रहेगी।
दूसरी जगह कर्नाटक में हम्पी थी। इसपर फिर से स्मार्टफ़ोन ने अपनी बुद्धि को बड़ा साबित करते हुए 3 दिन जाने और 3 दिन आने में लगने वाले समय का रोना रोया और रेलवे विभाग वाले उपरोक्त असहयोग वाला कंटक हमारे पैरों में घुसा मारा।
अब तक दिमाग और मेरी दही बिलो चुका था स्मार्टफ़ोन।
वैसे बात उसकी भी सही थी। दोनों स्थान अच्छी खासी दूरी पर हैं और व्यवस्था में राजकीय घाटे के मद्देनज़र हवाई यात्रा की गुंजाईश अच्छे दिन जैसी थी। जो पता तो थी की होती है पर हो नहीं सकती थी।
दिमाग ने अचानक दिल की सहायता (जो की गुप्तरूप से मंत्रणा में शामिल था) से खजुराहो का नाम सुझाया।
स्मार्टफ़ोन ने मौका लपकते हुए खजुराहो आवन जावन की सभी जानकारियों को मेरे समक्ष रख दिया। ठीक किसी चापलूस अधिकारी की तरह।
और अंतः खजुराहो ही उचित स्थान जान पड़ा।
रेलवे आरक्षण उपलब्ध था। वो करने से पहले दिल ने यात्रा में एक साथी की दरकार की, जो कि बहुत कम करता है। और नाम सुझाया रविंदर प्रताप सिंह।
भांजा कम मित्र ज्यादा। उसको फ़ोन मिला कर उसकी सहमति जानी। और उसकी हामी के बाद रेलवे आरक्षण कर दिया गया।
आरक्षण के बाद दिल ने गरियाते हुए एक नाम और सुझाया वीर बहादुर सिंह।
दिमाग ने अपनी चाल चलते हुए कहा कि आरक्षण हो गया है। किन्तु दिल मजबूती से नाम दोहराता रहा।
और अंत में वीर बहादुर सिंह को स्मार्टफ़ोन ने संपर्क साध कर उनकी रजामंदी ले ली।
खजुराहो दिल्ली से दूरी के हिसाब से एक ऐसा स्थान है जिसे एक रात्रि रेल यात्रा में कवर किया जा सकता है।
जिस से कम यात्रा करने वाले मित्रों को भी बोरियत से बचाया जा सकता है।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर 16 अक्टूबर 2015 का आरक्षण किया गया।
उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस (22448/ 22447) जो की प्रतिदिन दिल्ली से मानिकपुर और खजुराहो के बीच चलती है। यह एक स्लिप ट्रेन है। जिसका मतलब यात्रा के दौरान समझ आया।
ये मानिकपुर जाती है किन्तु आधे डिब्बे महोबा स्टेशन से अलग हो जाते हैं। और आधी रेल वहाँ से खजुराहो मध्यप्रदेश की तरफ और आधी मानिकपुर की तरफ चली जाती है।
महोबा स्टेशन ही इनके बंटवारे का स्थान है।
तो सभी बातें तय हो गयी। साथ जाने वाले मित्र और 16 अक्टूबर 2015 को जाना और 18 अक्टूबर 2015 को वापसी।
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