Friday, 15 September 2017

अंडमान यात्रा, प्रथम अध्याय



8 जुलाई 2017 की सुबह दिल्ली के T3 terminal ठीक 7:31 पर विस्तारा का हवाई जहाज उड़ गया कोलकाता के लिए, और दिल्ली दूर होती चली गई।

सुबह के 9:26 जहाज ज़मीन पर उतरा, कोलकाता के हवाई अड्डे को पहली बार देखा। कोलकाता में कोई रुचि न थी, मन में अंडमान के द्वीप घूम रहे थे। पहली बार इतनी ऊँचाई से गहरे सागर से घिरे हुए द्वीपों को देखने की इक्षा इतनी प्रबल थी कि कोलकाता एयरपोर्ट पर रुकना पल पल भारी सा लगा।

कोलकाता हवाई अड्डे से फ्लाइट ठीक 10:27 पर उड़ चली। अभी तक मुझे खिड़की वाली सीट न मिली थी, मने दिल्ली से कोलकाता का सफ़र बस पढ़ते हुए बीता। कोलकाता से उड़ान भरने से पहले ही मैं खिड़की को तरफ़ बैठ गया, ये सोच कर की कोई आएगा तो उठ जाऊँगा। अपनी इस सोच पर हँसी आई। जैसे बस में सफर कर रहा होऊँ 😀, ख़ैर शुक्र ये रहा कि कोई आया नहीं, औऱ लोगबाग भी कम ही रह गए थे, कोलकाता से कुछ लोग ही चढ़े थे।
मैं फ़िर से उड़ चला था अनजाने द्वीपों की तरफ़। अभी द्वीप आने में देर थी, अपने अगल बग़ल ध्यान दिया, एक सीट छोड़ कर, एक भाई दिखा, एकदम स्टाइलिश, मतलब मैं 80 के दशक की उपज, तो तो 90 का, मेरी जवानी जा चुकी है, उसकी आ रही थी। कपड़ों से एकदम ढिंचाक। नए ज़माने की P कैप, उसपर मस्त स्टाइल वाले गॉगल्स, पल में ही सोच लिया, कि भैया अपना मेल नहीं।
फिर थोड़ी देर में ही खाना पीना देना शुरू किया विस्तारा वालों ने, मुझे लगा कि दिल्ली कोलकाता के बीच मुझे खिला चुके हैं, अब मेरा नंबर नहीं लगेगा, जो लोग कोलकाता से चढ़े हैं उन्हीं को मिलेगा भोजन पानी, अपनी इक्षाओं को खिड़की की तरफ़ मोड़ दिया, उस तरफ़ देखना भी नहीं चाहता था जहाँ सब भकोस रहे होंगे, और मैं नहीं।

मेरे कानों में मिश्री घुली उसी वक़्त सर व्हाट वुड यू लाइक टू हैव, वेज नॉन वेज...हैं....यक़ीन नहीं हुआ, ऊपर से अंग्रेजी बोलती हुई सुंदर स्त्री, समझ से परे था मुआमला, पर हिम्मत जुटा कर खिड़की से नज़र उसकी नज़रों की तरफ ले गया, जी कुछ कहा, मेरे हुक्के से मुँह को देख समझ गई, देसी है। सर आप क्या खाना पसंद करेंगे, कुछ भी, बस नॉन-वेज न हो, वो क्या समझी, क्या सोचा बिना इसको जाने मैंने पूछा क्या है, उसने अंग्रेजी में जो बड़ा बड़ा सा बोला, मैं समझा क्या मस्त चीज़ होगी यार।

थोड़ी देर में आलू की टिक्की, और सफेद वाले मटर वाली सब्ज़ी के संग पैक्ड अवस्था में दे गई, और भी बहुत कुछ साथ था, सबकी क़्वालिटी बहुत उम्दा थी, स्वादिष्ट भी, पर मन में ख़याल थे कि भाई सीधा सीधा आलू की टिक्की भी तो बताया जा सकता था।
ख़ैर दुनिया की माया, अपुन समझ न पाया।

खाना पेट में अच्छे से पहुँच गया, जब ये पक्का हो गया, तो हाथ धोने का मन हुआ, उठा, और उस जवान लड़के से एक्सक्यूज़-मी के संबोधन से बात आरम्भ हुई, कि भाई जगह दो, हम वाशरूम हो आएँ।
वापस आने पर नौजवान को सॉरी बोला, क्योंकि उसके कानों में earphone लगा हुआ था, ज़ाहिर है मेरी आवन-जावन से उसके संगीत में ख़लल पड़ी थी, पर मेरे सॉरी को बड़ी विनम्रता से स्वीकार करके उसने अपने स्वभाव के अच्छे होने का पहला परिचय दिया।

नाम सूरज बताया उस लड़के ने, पूरा नाम B. Suraj, पहला प्रश्न, अंडमान घूमने जाते आप?? हाँ, दूसरा प्रश्न: अकेले?? हाँ, इस दूसरे प्रश्न के उत्तर को थोड़े मुश्किल से हजम किया भाई ने, अब भला दिल्ली से अंडमान जैसी दूरस्थ जगह कोई अकेले जाता है, जाता है भाई, घुमक्कड़ फक्कड़ जाता है।

पहले दूसरे प्रश्न के बाद इधर उधर से सवालों की बौछार हुई और अंजाने-पन भाई का वध हो गया उसी बौछार से। अबतक वो मेरे बारे में, मैं उसके बारे में बहुत कुछ जान चुके थे। वो सबकुछ जो यहाँ इस फेसबुक जैसे मंच पर जानने में कई साल लग जाते हैं कभी कभी।

टूर मैनेजर हैं भाई, पता चला, लो जी, जानकारियाँ ले लो, मन में आया, फिर लगा कि यार मैं घुमक्कड़ी करने निकला हूँ, घुमक्कड़ हूँ, पर्यटक बनने का काहे सोच रहा हूँ?? ख़ैर कई जानकारियाँ मिलीं। बहुत मिलनसार, मददगार स्वभाव का लड़का है। स्टाइल से नहीं लगता था। इसलिए कहा गया है पूर्वाग्रह ठीक नहीं अधिकतर 😊♥😊

#पिक्चर_अभी_बाक़ी_है_दोस्तों .......




2 comments:

  1. अच्छा लिखते हो लेकिन अधूरा है पूरा तो करो।

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  2. आपके साथ यात्रा की दूबारा शुरुआत हो रही है, वृत्तांत रोचक है। अगले भाग की प्रतिक्षा में..

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